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साहित्य सम्मेलन औपचारिक न रहकर आंदोलन बनना चाहिए: डॉ. सदानंद मोरे

आलंदी में १७वें नांदी साहित्य सम्मेलन का समापन संपन्न

साहित्य सम्मेलन औपचारिक न रहकर आंदोलन बनना चाहिए: डॉ. सदानंद मोरे

आलंदी में १७वें नांदी साहित्य सम्मेलन का समापन संपन्न

रिपोर्ट विशाल समाचार 

स्थान पुणे महाराष्ट्र

आलंदी, : “साहित्य सम्मेलनों की दीर्घ परंपरा मराठी भाषा का वैभव है। साहित्य सम्मेलन केवल औपचारिक न रहकर एक अखंड आंदोलन बनने चाहिए। इसके लिए १००वें साहित्य सम्मेलन के अवसर पर आयोजित ‘सम्मेलनों की नांदीयाली’ (नांदी श्रृंखला) महाराष्ट्र में साहित्य का नया माहौल तैयार करेगी।” यह बात साहित्य संस्कृति मंडल के अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सदानंद मोरे ने कही। वह विश्वशांति केंद्र आलंदी, माईर्स एमआईटी पुणे, महाराष्ट्र साहित्य परिषद और महाराष्ट्र सरकार के मराठी भाषा विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित १७वें नांदी सम्मेलन के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे।

 

इस अवसर पर डॉ. उल्हासदादा पवार सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे थे। माईर्स एमआईटी विश्वशांति विश्वविद्यालय के संस्थापक अध्यक्ष विश्वधर्मी प्रो. डॉ. विश्वनाथ कराड, खेड के विधायक बाबाजी काले और नेशनल बुक ट्रस्ट के निदेशक राजेश पांडे सम्मानित अतिथि के रूप में उपस्थित थे। मसाप (महाराष्ट्र साहित्य परिषद) के कार्यवाह सुनील महाजन, राजन लाखे, प्रभाकर ओव्हाळ, बापूसाहेब मोरे, उषाताई विश्वनाथ कराड और माईर्स एमआईटी की महासचिव प्रो. स्वाति कराड – चाटे आदि भी इस अवसर पर उपस्थित थे।

 

डॉ. सदानंद मोरे ने कहा, “मराठी दुनिया की एकमात्र ऐसी भाषा है, जिसके आद्यग्रंथकार (संत ज्ञानेश्वर) अमृत से भी शर्त जीतने की चुनौती देते हैं। हम अमृत को भी लज्जित करने वाली समृद्ध भाषा के वारिस हैं और इस वैभव को संभालना हमारा कर्तव्य है।”

 

डॉ. उल्हास पवार ने कहा, “आज संतों के विचारों की दिशा ही पूरी दुनिया का कल्याण कर सकती है। संत ज्ञानेश्वर का ‘पसायदान’ संयुक्त राष्ट्र (UN) के कार्यालय तक पहुंचकर सही मायनों में ‘विश्व प्रार्थना’ बन गया है; यही संत परंपरा और मराठी संस्कृति की वैश्विक ऊंचाई है।”

 

राजेश पांडे ने कहा, “नांदी सम्मेलन केवल समीक्षा के लिए नहीं हैं, बल्कि यह नींव रखने के लिए हैं कि अगले १०० वर्षों तक मराठी भाषा डिजिटल युग में कैसे टिकेगी, सक्षम रूप से बढ़ेगी और युग के अनुकूल बनेगी।”

 

विधायक बाबाजी काले ने कहा, “हमें मराठी भाषा पर गर्व होना चाहिए। संत साहित्य के मानवतावादी विचारों को मराठी भाषा के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी है।”

 

प्रो. स्वाति कराड – चाटे ने कहा, “संत साहित्य के विचारों के माध्यम से हमें ‘तीर्थ क्षेत्रों से ज्ञानतीर्थ क्षेत्रों की ओर’ बढ़ना है। आज विद्यार्थियों में साहित्य के प्रति रुचि पैदा करने के लिए संत साहित्य को शिक्षा में शामिल किया जाना चाहिए।”

 

आलंदी की फ्रूटवाले धर्मशाला में आयोजित १७वें नांदी सम्मेलन की शुरुआत माऊली (संत ज्ञानेश्वर) के मंदिर से निकाली गई ‘ग्रंथ दिंडी’ (शोभायात्रा) से हुई। दोपहर में हभप गुरुबाबा महाराज औसेकर का ‘चक्री भजन’ हुआ। ‘तीर्थ क्षेत्र का ज्ञानतीर्थ क्षेत्र में परिवर्तन’ विषय पर डॉ. संजय उपाध्ये की अध्यक्षता में हभप यशोधन महाराज साखरे, हभप बापूसाहेब मोरे और सचिन परब के बीच विचार-मंथन हुआ। अंत में डॉ. समीरा गुजर और डॉ. मधुरा वेलणकर का ‘ज्ञानदेवे रचिला पाया’ सांस्कृतिक कार्यक्रम संपन्न हुआ। कार्यक्रम का मंच संचालन डॉ. अतुल कुलकर्णी ने किया और डॉ. महेश थोरवे ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

 

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