
बैंकों का निजीकरण देश के आर्थिक विकास के खिलाफ: कॉ. सी. एच. वेंकटचलम
AIBOMEF के 9वें अखिल भारतीय अधिवेशन का उद्घाटन, सुचेता दलाल सम्मानित
पुणे विशाल सिंह : देश के आर्थिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन केंद्र सरकार विदेशी पूंजीपतियों के दबाव में बैंकों के निजीकरण की नीति आगे बढ़ा रही है, जो देशहित के खिलाफ है। सार्वजनिक बैंकों में आम जनता की 25 लाख करोड़ रुपये से अधिक की जमा पूंजी सुरक्षित है। ऐसे में बैंकों का निजीकरण आर्थिक स्थिरता और विकास दोनों के लिए घातक साबित होगा। यह आरोप ऑल इंडिया बैंक एम्प्लॉइज एसोसिएशन (AIBEA) के महासचिव कॉमरेड सी. एच. वेंकटचलम ने लगाया।
वे AIBEA से संबद्ध ऑल इंडिया बैंक ऑफ महाराष्ट्र एम्प्लॉइज फेडरेशन (AIBOMEF) के दो दिवसीय 9वें अखिल भारतीय अधिवेशन के उद्घाटन अवसर पर बोल रहे थे। अधिवेशन का आयोजन बीएमसीसी रोड स्थित दादासाहेब दरोडे सभागृह में किया गया, जिसमें देशभर से 600 से अधिक बैंक कर्मचारी शामिल हुए।
कॉ. वेंकटचलम ने कहा कि आज कई निजी बैंकों का भविष्य अनिश्चित है और वे संकट का सामना कर रहे हैं, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक मुनाफे में हैं। इसके बावजूद सरकारी बैंकों के निजीकरण की बात करना समझ से परे है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों तक मजबूत नेटवर्क रखने वाले सार्वजनिक बैंकों को कमजोर करने के बजाय उन्हें और सशक्त किया जाना चाहिए। इसके लिए बड़े पैमाने पर भर्ती, बेहतर ग्राहक सेवा और श्रम विरोधी नीतियों के खिलाफ संघर्ष को तेज करना होगा।
उन्होंने सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि इन नीतियों के कारण अमीर और गरीब के बीच की खाई लगातार बढ़ रही है। एक ओर रोजगार सृजन की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर कर्मचारियों की संख्या घटाई जा रही है, जिससे बैंकिंग सेवाएं प्रभावित हो रही हैं। युवाओं को स्थायी और सुरक्षित रोजगार चाहिए, लेकिन ठेका प्रथा और ‘अग्निवीर’ जैसी योजनाएं इसका समाधान नहीं हैं।
सुचेता दलाल को ‘कॉ. सुरेश धोपेश्वरकर स्मृति पुरस्कार’

इस अवसर पर वरिष्ठ अर्थपत्रकार एवं मनीलाइफ फाउंडेशन की संस्थापक पद्मश्री सुचेता दलाल को बैंकिंग और आर्थिक पत्रकारिता में चार दशकों से अधिक के योगदान के लिए ‘कॉ. सुरेश धोपेश्वरकर स्मृति पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।
पुरस्कार स्वीकार करते हुए सुचेता दलाल ने कहा कि यह सम्मान उनके लिए गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि 2017 में बैंक सेवा शुल्क वृद्धि के खिलाफ चलाए गए ‘ट्विटर आंदोलन’ से यह साबित हुआ कि यदि उपभोक्ता संगठित होकर आवाज उठाएं, तो नीतिगत बदलाव संभव हैं। सोशल मीडिया के दबाव के चलते रिजर्व बैंक को सेवा शुल्क पर नियंत्रण करना पड़ा। उन्होंने कहा कि बैंकिंग नीतियों का केंद्र बिंदु हमेशा ग्राहक होना चाहिए।
एनपीए और कॉर्पोरेट राहत पर सवाल
सुचेता दलाल ने बढ़ते एनपीए और बड़े उद्योगपतियों को दी जा रही रियायतों पर कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि छोटे कर्जदारों को दो-चार लाख रुपये के ऋण के लिए परेशान किया जाता है, उनकी संपत्तियां जब्त की जाती हैं, जबकि हजारों करोड़ रुपये के कर्जदारों को 50 से 95 प्रतिशत तक की राहत दे दी जाती है। यह जनता के पैसे की खुली बर्बादी है। उन्होंने बैंक कर्मचारियों की यूनियनों से इस अन्याय के खिलाफ अधिक आक्रामक संघर्ष करने का आह्वान किया।
बैंक ऑफ महाराष्ट्र प्रबंधन का पक्ष
बैंक ऑफ महाराष्ट्र के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी निधू सक्सेना ने कहा कि बैंक ऑफ महाराष्ट्र एक प्रगतिशील राष्ट्रीयकृत बैंक है, जो कर्मचारियों के हित और बेहतर ग्राहक सेवा को प्राथमिकता देता है। कर्मचारियों और उनके परिवारों के कल्याण के लिए कई योजनाएं लागू की जा रही हैं और सभी के सहयोग से बैंक को देश के अग्रणी बैंकों में शामिल किया जा सकता है।
कार्यक्रम में बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व महाप्रबंधक वी. सी. जोशी, बैंक ऑफ महाराष्ट्र ऑफिसर्स एसोसिएशन के महासचिव कॉ. कृष्णा बरुरकर, AIBEA के उपाध्यक्ष कॉ. एन. शंकर, संयुक्त महासचिव कॉ. ललिता जोशी, महासचिव देविदास तुलजापुरकर सहित अनेक पदाधिकारी उपस्थित थे।



