
फसल और फल फसल बीमा योजना में किसानों की भागीदारी बढ़ाएं, व्यापक जनजागरूकता करें – वैभव तांबे
रबी सीजन की फसलों के साथ फल फसलों का भी बीमा कराने की अपील; कृषि विभाग, बैंकों और बीमा कंपनियों को दिए निर्देश
रिपोर्ट विशाल समाचार
स्थान पुणे महाराष्ट्र
पुणे,। किसानों को प्राकृतिक आपदाओं, प्रतिकूल मौसम और फसल उत्पादन में कमी से होने वाले आर्थिक नुकसान से सुरक्षा दिलाने के लिए अधिक से अधिक किसानों को फसल बीमा और फल फसल बीमा योजना में शामिल होना चाहिए। सूखे की स्थिति और सिंचाई के लिए पानी की अनिश्चित उपलब्धता को देखते हुए रबी सीजन की फसलों का बीमा कराना भी बेहद जरूरी है। योजनाओं की जानकारी गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए कृषि विभाग, बैंकों और बीमा कंपनियों को आपसी समन्वय के साथ व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाना चाहिए। यह अपील जिला अधीक्षक कृषि अधिकारी वैभव तांबे ने की।
जिलाधिकारी जितेंद्र डुडी के निर्देशानुसार जिलाधिकारी कार्यालय में फसल बीमा और फल फसल बीमा योजनाओं के क्रियान्वयन की समीक्षा के लिए आयोजित बैठक में वे बोल रहे थे। इस अवसर पर जिला अग्रणी बैंक प्रबंधक योगेश पाटील, उपविभागीय कृषि अधिकारी, तहसील कृषि अधिकारी, कृषि विभाग के क्षेत्रीय अधिकारी और बीमा कंपनियों के प्रतिनिधि उपस्थित थे।
खरीफ फसलों के उत्पादन में गिरावट
फसल कटाई प्रयोगों के आधार पर फसलों की उत्पादकता निर्धारित की जाती है और उसी के अनुसार बीमा मुआवजे की गणना होती है। इस वर्ष खरीफ सीजन की कई फसलों के उत्पादन में गिरावट दर्ज की जा रही है। मूंग का अपेक्षित औसत उत्पादन करीब साढ़े सात क्विंटल रहने की उम्मीद थी, लेकिन वास्तविक उत्पादकता में कमी आई है। उड़द के उत्पादन में भी गिरावट दर्ज की गई है।
सोयाबीन के उत्पादन में लगभग 20 से 22 प्रतिशत और मक्का के उत्पादन में करीब 15 प्रतिशत की कमी आई है। धान की फसल के कटाई प्रयोग जारी हैं, जिनमें भी बड़ी गिरावट की आशंका जताई जा रही है। अरहर और प्याज के उत्पादन पर भी असर पड़ने की संभावना है।
सूखे की स्थिति और अनियमित बारिश को देखते हुए खरीफ सीजन में उत्पादन में आई यह गिरावट महत्वपूर्ण है। बाजरा को छोड़कर अन्य फसलों की उत्पादकता के आधार पर किसानों को फसल बीमा का मुआवजा मिलने की संभावना है, ऐसा तांबे ने बताया।
रबी फसलों का बीमा कराने की अपील
जिले में रबी सीजन के दौरान गेहूं का लगभग 40 हजार हेक्टेयर, जबकि मक्का और चने का प्रत्येक का करीब 25 हजार हेक्टेयर क्षेत्र है। प्याज और ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती भी बड़े पैमाने पर होती है।
इन फसलों के लिए बीमा प्रीमियम अपेक्षाकृत कम है। ज्वार, गेहूं, चना और प्याज जैसी फसलों के लिए लगभग 60 से 70 रुपये प्रति हेक्टेयर बीमा प्रीमियम देना होता है। ऐसे में कम खर्च में किसानों को आर्थिक सुरक्षा मिल सकती है।
कुछ क्षेत्रों में किसान बारिश की नमी के आधार पर बुवाई करते हैं, जबकि कुछ क्षेत्रों में कुएं या नहर के पानी से खेती की जाती है। लेकिन बुवाई के बाद आगे सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध होगा या नहीं, इसकी कोई निश्चितता नहीं होती। ऐसी परिस्थितियों में फसल उत्पादन प्रभावित होने की आशंका रहती है। इसलिए किसानों को शुरुआत में ही फसल का बीमा कराना चाहिए।
चालू सीजन के लिए फसल बीमा योजना का पोर्टल 2 नवंबर से शुरू हो चुका है। बैंकों को भी अपने स्तर पर किसानों को योजना की जानकारी देकर अधिक से अधिक भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।
पिछले वर्ष खरीफ सीजन में किसानों ने करीब 71 लाख रुपये का बीमा प्रीमियम जमा किया था, जबकि इसके बदले किसानों को लगभग 14 करोड़ 20 लाख रुपये का मुआवजा मिला। इससे स्पष्ट होता है कि फसल बीमा योजना का वास्तविक लाभ किसानों तक पहुंच रहा है।
फल फसल बीमा के क्षेत्र में ढाई गुना वृद्धि
बैठक में फल फसल बीमा योजना की भी समीक्षा की गई। पिछले वर्ष मृग बहार में 176 किसानों ने 104 हेक्टेयर क्षेत्र का बीमा कराया था। इनमें से 117 किसानों को करीब 54 लाख रुपये का मुआवजा मिला।
चालू वर्ष में आम की फसल के लिए बीमा संरक्षित क्षेत्र 104 हेक्टेयर से बढ़कर 254 हेक्टेयर हो गया है। इस प्रकार इसमें ढाई गुना वृद्धि दर्ज की गई है।
जिले में केले की खेती का क्षेत्र लगभग चार हजार हेक्टेयर है, लेकिन इसके मुकाबले बीमा संरक्षित क्षेत्र अभी भी कम है। केला उत्पादक किसानों के पास बीमा कराने के लिए 15 नवंबर तक का समय है। आम की फसल के लिए 30 नवंबर और अनार के लिए 14 जनवरी तक बीमा कराया जा सकता है।
तांबे ने कृषि विभाग के क्षेत्रीय अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे संबंधित फल उत्पादक किसानों से संपर्क कर बीमा योजना में उनकी भागीदारी बढ़ाएं।
ओलावृष्टि से होने वाले नुकसान के लिए अतिरिक्त बीमा सुरक्षा जरूरी
फल फसल बीमा योजना में तापमान, हवा की गति और आर्द्रता जैसे मौसम संबंधी आंकड़ों के आधार पर मुआवजा निर्धारित किया जाता है। इसके लिए राजस्व मंडल स्तर पर स्वचालित मौसम केंद्रों की व्यवस्था की गई है। हालांकि, ओलावृष्टि से होने वाले नुकसान के लिए अलग से अतिरिक्त बीमा सुरक्षा (ऐड-ऑन कवर) लेना आवश्यक है।
ओलावृष्टि होने पर किसानों को तत्काल तहसील कृषि अधिकारी कार्यालय, कृषि सहायक या बीमा कंपनी को सूचना देनी चाहिए। इस प्रकार के नुकसान के लिए व्यक्तिगत पंचनामा किया जाता है। कृषि विभाग के कर्मचारी और बीमा कंपनी के प्रतिनिधि मौके पर जाकर निरीक्षण करते हैं तथा नुकसान का आकलन करते हैं।
इसलिए फल फसल का बीमा कराते समय किसानों को ओलावृष्टि से होने वाले नुकसान के अतिरिक्त बीमा संरक्षण का भी लाभ लेना चाहिए।
बीमा कंपनियों के कामकाज पर निगरानी रखने के निर्देश
चालू वर्ष में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के लिए एचडीएफसी एर्गो और फल फसल बीमा योजना के लिए एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया (एआईसी) को नियुक्त किया गया है।
दोनों कंपनियों के जिला स्तर पर कार्यालय और तहसील स्तर पर प्रतिनिधि उपलब्ध हैं। ये प्रतिनिधि किसानों को सही जानकारी दे रहे हैं या नहीं, बीमा पंजीकरण में सहयोग कर रहे हैं या नहीं तथा योजनाओं का प्रचार-प्रसार प्रभावी ढंग से हो रहा है या नहीं, इस पर तहसील कृषि अधिकारियों को नियमित निगरानी रखनी चाहिए।
वैभव तांबे ने निर्देश दिए कि कृषि विभाग, बैंक और बीमा कंपनियां आपसी समन्वय से कार्य करें, ताकि फसल बीमा और फल फसल बीमा योजनाओं का लाभ जिले के अधिक से अधिक किसानों तक पहुंच सके।



