
सतत विकास के लिए उपलब्ध जल संसाधनों का विनियमन आवश्यक
भविष्य में जल के कारण चौथे विश्व युद्ध की सम्भावना डॉ. संजय चहांडे का वक्तव्य: ‘पर्यावरण के लिए खाद्य, सौर ऊर्जा और जल संरक्षण’ विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन
पुणे / महाराष्ट्र: महाराष्ट्र जल संसाधन नियामक प्राधिकरण के सेवानिवृत्त अध्यक्ष डॉ. संजय चाहंदे ने कहा कि बढ़ती जनसंख्या, सिकुड़ता कृषि क्षेत्र और भूजल की अत्यधिक निकासी देश में उपलब्ध जल संसाधनों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है. साथ ही, भविष्य में पानी को लेकर चौथा विश्व युद्ध होगा. इसलिए पानी की हर बूंद महत्वपूर्ण हो और वह मूल्यवान (जवाबदेह) हो, इसके लिए सभी सामाजिक समूहों में जागरूकता पैदा करना जरूरी है. इसके माध्यम से ही जल, भोजन और ऊर्जा सुरक्षा का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है.
वह लैम्ब्डा अल्फा इंटरनेशनल (यूएसए) और एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी, ओएम एलआई चैप्टर, पुणे (भारत) से संबद्ध सोसाइटी फॉर लैंड इकोनॉमिक्स द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन पर बतौर मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे. यह राष्ट्रीय सम्मेलन ‘जल संरक्षण के माध्यम से खाद्य, सौर ऊर्जा और पर्यावरण सुरक्षा’ की केंद्रीय अवधारणा पर था. कार्यक्रम की अध्यक्षता एमआईटी डब्ल्यूपीयू के कुलपति डॉ. आर. एम. चिटनिस ने निभाई.
इस अवसर पर ओएम एलआई चैप्टर पुणे के अध्यक्ष, वास्तुकार एवं शहरी नियोजक अनिल कुमार हाटकर, कोलंबो में अंतर्राष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान के डॉ. तुषार शाह, ओएम एलआई के उप महाप्रबंधक प्रकाश पाटिल, जे. जे.कॉलेज प्रो. राजीव मिश्रा और स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड कॉमर्स के संस्थापक प्रो.डॉ. अंजलि साने और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे.
डॉ. संजय चहांडे ने कहा, ‘मानव अस्तित्व के लिए पानी इतना आवश्यक है कि हमारे अंतरिक्ष मिशनों का एक लक्ष्य पानी की खोज करना है. हालाँकि पृथ्वी पर जल संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं, लेकिन मानव उपयोग के लिए जल संसाधन सीमित हैं. उपलब्ध जल संसाधनों, अनियमित वर्षा, बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण के लिए पानी की बढ़ती मांग, अनियंत्रित भूजल दोहन की चुनौतियों का समाधान खोजने के लिए जल संसाधनों पर नियंत्रण आवश्यक है. इन चुनौतियों से निपटने के लिए राज्य सरकार की नीति को भी पूरक बनाया गया है. इस नीति के पीछे सतत विकास का लक्ष्य है.
अनिलकुमार हाटकर ने कहा, ‘मानव कल्याण, सूखा राहत और सतत विकास के लिए, जल, भूजल स्तर संकट, ऊर्जा उपयोग और इसके कार्यान्वयन, पर्यावरण में बढ़ी हुई ऊर्जा को बनाए रखने और कम करने के लिए सर्वोत्तम प्रौद्योगिकी विधियों के उपयोग के संदर्भ में सम्मेलन बहुत महत्वपूर्ण है.
डॉ.आर.एम. चिटनिस ने कहा, पृथ्वी का 71 फीसदी हिस्सा पानी से घिरा है और तीन फीसदी पानी पीने योग्य है. भविष्य में युद्ध पानी को लेकर लड़े जाएंगे, इसलिए सभी को सतत विकास के लिए काम करना चाहिए. इसकी गंभीरता को ध्यान में रखते हुए यूजीसी ने सभी छात्रों के लिए पर्यावरण विषय अनिवार्य कर दिया है. इस समिति में देश के पांच सर्वोच्च अधिकारी शामिल हैं. साथ ही पर्यावरण संरक्षण के लिए संपूर्ण जनता की भागीदारी बहुत जरूरी है.
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में विशेषज्ञों ने औद्योगिक क्षेत्रों में पानी, भूजल स्तर संकट, ऊर्जा खपत, भोजन और ऊर्जा के बीच परस्पर निर्भरता और वैश्विक समीक्षा पर विचार प्रस्तुत किये.
इसके बाद आयोजित विभिन्न सत्रों में डाॅ. हिमांशु कुलकर्णी ने कहा, ‘आधुनिक किसानों ने भारत में भूजल के टिकाऊ और पारंपरिक प्रबंधन तरीकों को नजरअंदाज कर दिया है. परिणामस्वरूप, फसलों में विविधता नष्ट हो गई है.
वरिष्ठ वैज्ञानिक डाॅ. तुषार शाह ने कहा, भूजल की उपलब्धता के मामले में भारत को ‘भूजल सम्राट’ कहा जाना चाहिए.
डॉ। रवींद्र उटगीकर ने कहा, ‘बायो-इकोनॉमी’ की ओर कैसे बढ़ें, सौर, पवन, जल, परमाणु, थर्मल ऊर्जा को हरित और स्वच्छ ऊर्जा में कैसे परिवर्तित करें और हरित विकास कैसे प्राप्त करें.
शेखर गायकवाड़ ने कहा, चीनी मिलों के कारण पानी की खपत बढ़ रही है. साथ ही भूजल स्तर भी गिरता जा रहा है. इसलिए जल का उचित नियोजन आवश्यक है. चीनी उद्योग से उत्पादित इथेनॉल का उपयोग बढ़ाना आवश्यक है.
पंकज पल्लेवार ने कहा, आज के समय में अगर किसान सौर ऊर्जा का अधिक से अधिक उपयोग करें तो इससे कृषि को फायदा होगा.
राजेंद्र हुलानी ने कहा, वातावरण में बदलाव के कारण बारिश की मात्रा कम हो गई है. चूंकि ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की कमी है, इसलिए पानी का पुनर्चक्रण करना आवश्यक है.
डॉ. नितिन बस्सी ने कहा, जलवायु परिवर्तन के कारण भारत एक उष्णकटिबंधीय देश बनता जा रहा है. राज्य के अलग-अलग हिस्सों का माहौल अलग-अलग है. कुछ जगहों पर सूखा और बाढ़ जैसे हालात देखने को मिल रहे हैं. इसलिए पर्यावरण की रक्षा करना जरूरी है.
डॉ.अंजलि साने ने परिचय दिया. संचालन डॉ. प्रीति जोशी ने किया



