पूणेमहाराष्ट्ररोजगार

आरबीआई के नियामक ढांचे के केंद्र में जमाकर्ताओं का हित : सतीश मराठे

आरबीआई के नियामक ढांचे के केंद्र में जमाकर्ताओं का हित : सतीश मराठे

आईएमडीआर’ द्वारा “भारत में जमाकर्ताओं की आवाज और बैंक प्रशासन” विषय पर संगोष्ठी

रिपोर्ट: विशाल समाचार

स्थान:पुणे महाराष्ट्र

पुणे : “जमाकर्ता संरक्षण भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के नियामक और पर्यवेक्षी ढांचे के केंद्र में है। भले ही जमाकर्ताओं का बैंक के निदेशक मंडल में प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व न हो, लेकिन पूरी नियामक संरचना उनके हितों की सुरक्षा और वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए निर्मित की गई है,” यह प्रतिपादन सतीश मराठे, केंद्रीय मंडल के निदेशक, भारतीय रिज़र्व बैंक ने किया।

डेक्कन एज्युकेशन सोसायटी संचालित इन्स्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट डेवलपमेंट एंड रिसर्च (आईएमडीआर) द्वारा “भारत में जमाकर्ताओं की आवाज और बैंक प्रशासन” विषय पर आयोजित शोध-आधारित परिसंवाद में वे मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर वरिष्ठ नीति-निर्माता, बैंकिंग क्षेत्र के विशेषज्ञ, प्राध्यापक, पेशेवर तथा विद्यार्थियों ने भारत में विकसित हो रही बैंक प्रशासन व्यवस्था पर विस्तृत चर्चा की।

कार्यक्रम में डेक्कन एज्युकेशन सोसायटी के विश्वस्त विवेक मठकरी, पूर्व विश्वस्त महेश आठवले, आईएमडीआर की संचालिका डॉ. शिखा जैन तथा अल्युमिना कंसल्टिंग की संस्थापक-संचालिका अंजली पाटील सहित अनेक गणमान्य उपस्थित थे।

अपने संबोधन में सतीश मराठे ने भारत तथा वैश्विक स्तर पर जमाकर्ता संरक्षण के ऐतिहासिक विकास का अवलोकन प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि स्वतंत्रता के बाद भारत में जमा बीमा व्यवस्था की स्थापना की गई, जिसके परिणामस्वरूप आज देश में छोटे जमा खातों का लगभग पूरा हिस्सा बीमा संरक्षण के दायरे में आता है। इससे वैश्विक मानकों के अनुरूप व्यवस्था सुनिश्चित होती है तथा बैंकिंग प्रणाली पर जनविश्वास सुदृढ़ होता है।

उन्होंने कहा कि बैंकों के लिए सावधानी और नियंत्रित जोखिम स्वीकृति के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। अत्यधिक जोखिम से वित्तीय अस्थिरता पैदा हो सकती है, जबकि अत्यधिक सतर्कता से ऋण प्रवाह और आर्थिक विकास प्रभावित हो सकता है।

बैंकिंग क्षेत्र की उभरती चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जमाकर्ताओं की प्रकृति बदल रही है और वे अब निवेशक की भूमिका में भी दिखाई दे रहे हैं। जोखिम प्रबंधन को अधिक गतिशील बनाना समय की मांग है। तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डेटा विश्लेषण की भूमिका नियामकीय निगरानी में तेजी से बढ़ रही है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि निदेशक मंडल में जमाकर्ताओं को प्रत्यक्ष स्थान मिलने की संभावना अत्यंत सीमित है, क्योंकि लाखों जमाकर्ताओं में से वास्तविक प्रतिनिधि का चयन संस्थागत रूप से जटिल प्रक्रिया है। साथ ही, यदि जमाकर्ता सीधे मंडल में शामिल होते हैं, तो निर्णय प्रक्रिया में अत्यधिक जोखिम से बचने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।

यह परिसंवाद ‘इंदिरा अनंत आठवले स्मृति अनुसंधान निधि’ के अंतर्गत प्रो. दर्शन बागडे के शोध पर आधारित था। डॉ. शिखा जैन और प्रो. हृषिकेश खळदकर ने शोध में सहयोग प्रदान किया। निधि के प्रवर्तक महेश आठवले ने कहा कि समाजोन्मुख एवं नीतिगत अनुसंधान को प्रोत्साहन देना इस निधि का उद्देश्य है तथा शैक्षणिक संस्थानों द्वारा व्यावहारिक नीति-प्रश्नों पर शोध करना अत्यंत आवश्यक है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button