
कविता के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि वरिष्ठ कवि डॉ. विठ्ठल वाघ के विचार
सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉ. शेषराव पाटील द्वारा लिखित ‘रानफुले’ काव्य संग्रह का विमोचन
रिपोर्ट: विशाल समाचार
स्थान:पुणे महाराष्ट्र
पुणे, : “कविता पाठकों को सजग बनाती है। काव्य से उत्पन्न शुद्ध सृजनात्मक विचार मनुष्य को नई दृष्टि देता है। कविता के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि अत्यंत महत्वपूर्ण है और पर्यावरण संरक्षण व विकास के लिए साहित्य का निर्माण होना चाहिए।” ऐसे विचार सुप्रसिद्ध वरिष्ठ कवि डॉ. विठ्ठल वाघ ने व्यक्त किए। विश्व पृथ्वी दिवस और विश्व पुस्तक दिवस के अवसर पर गोखलेनगर स्थित वन भवन के कॉन्फ्रेंस हॉल में साहित्यविश्व प्रकाशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉ. शेषराव पाटील द्वारा लिखित ‘रानफुले’ काव्य संग्रह के विमोचन के अवसर पर वे मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे।
पुणे प्रादेशिक वनवृत्त के वन संरक्षक आशिष ठाकरे कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे। सेवानिवृत्त मुख्य वन संरक्षक रंगनाथ नाईकडे, उप वन संरक्षक (सामाजिक वनीकरण) पंकज गर्ग, उप वन संरक्षक (अनुसंधान) लक्ष्मण पाटील, कवि डॉ. शेषराव पाटील, प्रभाताई विठ्ठल वाघ, वर्षा शेषराव पाटील, प्रकाशक विक्रम मालन आप्पासो शिंदे, कवि रामदास पुजारी, विभागीय वन अधिकारी अमोल थोरात, सहायक वन संरक्षक आशुतोष शेंडगे व मंगेश ताटे उपस्थित थे। इसके अलावा शिरीष अस्थाना, सत्यजित गुजर, प्रकाश लोणकर, यशवंत पाटील, विठ्ठल सूर्यवंशी, विठ्ठल धोकटे सहित वन विभाग के अनेक वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी, कार्यरत अधिकारी, कर्मचारी तथा प्रकृति प्रेमी नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
डॉ. विठ्ठल वाघ ने कहा, “आज जल, जमीन और जंगल को बचाने की स्थिति उत्पन्न हो गई है। यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को खुली हवा में सांस देना चाहते हैं, तो पर्यावरण के घटकों का संरक्षण करना आवश्यक है। इसके लिए जनजागरण महत्वपूर्ण है और कविता एक प्रभावी माध्यम सिद्ध होती है। डॉ. शेषराव पाटील की पर्यावरण विषयक कविताएँ आधुनिक युग के ‘वन के श्लोक’ हैं, जो प्रकृति का महत्व दर्शाती हैं।”
डॉ. शेषराव पाटील ने कहा, “वन विभाग में सेवा के दौरान प्राप्त पर्यावरण संबंधी अनुभवों, अवलोकनों, आवश्यकताओं, उपायों और संरक्षण के विचारों का संकलन *‘रानफुले’* में प्रस्तुत किया गया है। पर्यावरण के प्रति जनजागृति के उद्देश्य से अनेक कविताएँ लिखी गई हैं।”
रंगनाथ नाईकडे ने कहा, “पेड़ और वन पृथ्वी के कवच-कुंडल हैं। मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए वृक्षों की कटाई कर पर्यावरण का विनाश कर रहा है। बढ़ते तापमान और अन्य पर्यावरणीय समस्याओं से पृथ्वी को बचाना है तो वृक्षारोपण और वृक्ष संरक्षण ही एकमात्र उपाय है।”
पंकज गर्ग ने कहा, “हाल के समय में समाज में लेखन की प्रवृत्ति कम हो गई है। लोगों की एकाग्रता भी घट रही है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने अनुभवों के आधार पर प्रतिदिन कुछ न कुछ लिखना चाहिए। लिखना, पढ़ना और लेखन का दस्तावेजीकरण हमारी मूलभूत आदतें बननी चाहिए।”
डॉ. विठ्ठल वाघ ने इस कार्यक्रम में खेती और मिट्टी विषयक कई कविताओं का गायन भी किया। कार्यक्रम का संचालन कवि रामदास पुजारी ने किया, जबकि प्रकाशक विक्रम मालन आप्पासो शिंदे ने आभार व्यक्त किया।
