
स्मार्ट मीटरों के नाम पर बड़ा खेल?
गरीब और मध्यमवर्गीय उपभोक्ताओं की जेब पर ‘साइलेंट डाका’ का आरोप, विभाग पर उठे गंभीर सवाल
रिपोर्ट :विशाल समाचार
स्थान:लखनऊ उत्तर प्रदेश
लखनऊ। उत्तरप्रदेश में स्मार्ट मीटरों को लेकर अब बड़ा विवाद खड़ा होता जा रहा है। राजधानी लखनऊ समेत कई जिलों में पुराने चेक मीटरों और नए स्मार्ट मीटरों की रीडिंग में भारी अंतर सामने आने के बाद बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। उपभोक्ताओं का आरोप है कि स्मार्ट मीटर जरूरत से ज्यादा यूनिट दर्ज कर रहे हैं, जिससे बिजली बिलों में भारी बढ़ोतरी हो रही है और इसका सीधा बोझ गरीब व मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ रहा है।
गोमतीनगर के विशाल खंड में एक उपभोक्ता के यहां स्मार्ट मीटर की रीडिंग पुराने मीटर से 52 यूनिट अधिक पाई गई, जबकि दूसरे घर में 41 यूनिट का अंतर सामने आया। एक अन्य मामले में पुराने मीटर की रीडिंग 3452 यूनिट थी, लेकिन स्मार्ट मीटर 3501 यूनिट दिखा रहा था। हैरानी की बात यह रही कि उपभोक्ता को दी गई पर्ची में रीडिंग लगभग समान बताई गई।
अब सवाल यह उठ रहा है कि अगर हर मामले में यूनिट बढ़ी हुई ही मिल रही है तो आखिर इसका फायदा किसे हो रहा है?
राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने भी पूरे मामले को गंभीर बताते हुए जांच की मांग की है। परिषद अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि यदि लगातार स्मार्ट मीटरों में ज्यादा रीडिंग आ रही है तो यह सामान्य तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि गंभीर जांच का विषय है। उन्होंने मांग की कि स्मार्ट मीटरों की गुणवत्ता और कार्यप्रणाली की जांच Central Power Research Institute से कराई जाए।
यूपी में अब तक करीब 85 लाख स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं। ऐसे में यदि मीटरों की रीडिंग में गड़बड़ी की आशंका सही साबित होती है तो यह करोड़ों उपभोक्ताओं से जुड़ा बड़ा मामला बन सकता है।
इतना ही नहीं, ग्रामीण इलाकों में भी बिजली बिल को लेकर लंबे समय से शिकायतें उठती रही हैं। कई ग्रामीण उपभोक्ताओं का आरोप है कि विभाग जानबूझकर 5 से 6 महीने तक बिल जारी नहीं करता। आरोप है कि लंबे समय तक रीडिंग नहीं लेने से यूनिट अधिक स्लैब में पहुंच जाती है, जिसके बाद उपभोक्ताओं पर भारी बिल थोप दिया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि हर महीने नियमित बिल जारी हो तो यूनिट कम स्लैब में रहती और बिल भी कम आता, लेकिन महीनों बाद एक साथ बिल निकालकर उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ डाला जाता है।
वहीं विभाग से जुड़े सूत्रों के हवाले से भी कई गंभीर बातें सामने आ रही हैं। सूत्रों का दावा है कि उपभोक्ताओं की शिकायतों को पोर्टल और कॉल प्रक्रिया में उलझाकर धीरे-धीरे शांत करने की रणनीति अपनाई जाती है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।
उपभोक्ताओं का कहना है कि स्मार्ट मीटर और लंबित बिल व्यवस्था अब पारदर्शिता से ज्यादा कमाई का जरिया बनती जा रही है। लोगों का आरोप है कि बिजली विभाग तकनीक के नाम पर आम जनता की जेब पर अतिरिक्त बोझ डाल रहा है, जबकि गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है —
क्या स्मार्ट मीटर वास्तव में सुविधा और पारदर्शिता के लिए लगाए गए हैं, या फिर आम उपभोक्ताओं से ज्यादा वसूली का नया माध्यम बन चुके हैं?
