
त्विशा शर्मा की स्मृति में इंदिरा यूनिवर्सिटी ने शुरू की ‘इंदिरा स्त्री’ पहल
रिपोर्ट: विशाल समाचार
स्थान: पुणे महाराष्ट्र
पुणे, -इंदिरा यूनिवर्सिटी, पुणे ने आज अपनी पूर्व छात्रा त्विशा शर्मा की स्मृति में एक प्रार्थना सभा आयोजित की। एक बेटी, एक युवा महिला और अपने परिवार व संस्थान के लिए बेहद प्रिय रही त्विशा की दहेज उत्पीड़न के कारण हुई दुखद मृत्यु ने पूरे विश्वविद्यालय समुदाय को गहरे शोक में डाल दिया। इस दर्दनाक घटना ने संस्थान को केवल शोक व्यक्त करने तक सीमित न रहकर, महिलाओं के समर्थन और सुरक्षा के लिए एक ठोस कदम उठाने की प्रेरणा दी।
त्विशा के माता-पिता इस सभा में वर्चुअली शामिल हुए। पूरा माहौल गहरे मौन में डूबा रहा, और वह मौन बहुत कुछ कह गया।
डॉ. तरिता शंकर, अध्यक्षा- इंदिरा यूनिवर्सिटी वी मार्गदर्शिका- इंदिरा ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट्स के नेतृत्व में इस अवसर पर ‘इंदिरा स्त्री’ नामक एक विशेष सहायता पहल की आधिकारिक शुरुआत की गई। यह पहल यूनिवर्सिटी से जुड़ी हर महिला के लिए है, चाहे वह छात्रा हो, पूर्व छात्रा हो या किसी भी जीवन चरण में हो। इस सभा में फैकल्टी, छात्र-छात्राएं और संस्थान के वरिष्ठ सदस्य उपस्थित रहे। सभी लोग एकजुट थे, क्योंकि उन्हें एहसास था कि सिर्फ शोक व्यक्त करना ही काफी नहीं है।
डॉ. तरिता शंकर ने कहा,“त्विशा के साथ जो हुआ, वह किसी के साथ नहीं होना चाहिए। लेकिन दुख की बात है कि ऐसी घटनाएं हमारी सोच से कहीं ज़्यादा होती हैं और अक्सर चुप्पी के पीछे दब जाती हैं। आज हम साफ़ शब्दों में कहना चाहते हैं कि अगर आप हमसे जुड़ी हैं, तो आप कभी अकेली नहीं होंगी। यह सिर्फ एक वादा नहीं, बल्कि एक संकल्प है, जिसकी शुरुआत आज से हो रही है।”
भारत में दहेज उत्पीड़न आज भी कई महिलाओं के जीवन को प्रभावित कर रहा है। अक्सर यह दर्द सामाजिक चुप्पी और कलंक के पीछे दबकर रह जाता है। आज की यह सभा उसी चुप्पी को तोड़ने और इस मुद्दे पर संवेदनशीलता व जागरूकता बढ़ाने का एक प्रयास थी।

‘इंदिरा स्त्री’ के माध्यम से महिलाओं को भावनात्मक सहयोग, मानसिक स्वास्थ्य परामर्श, करियर मार्गदर्शन, मेंटरशिप, कानूनी सहायता, शिकायत निवारण और आपातकालीन सहयोग जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी, ताकि कोई भी महिला अपने संघर्षों का सामना अकेले न करे।
सभा में वक्ताओं ने दहेज उत्पीड़न की वास्तविकताओं, यूनिवर्सिटी छोड़ने के बाद महिलाओं द्वारा महसूस किए जाने वाले अकेलेपन और संस्थागत सीमाओं से परे मजबूत सहायता तंत्र की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका संदेश स्पष्ट था कि यह केवल त्विशा को श्रद्धांजलि देने तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके नाम पर उठाई गई एक ऐसी आवाज़ है, जो यह सुनिश्चित करना चाहती है कि उनकी मृत्यु चुप्पी में खो जाने वाला एक और आंकड़ा बनकर न रह जाए।
त्विशा की इस दुखद क्षति ने एक बात स्पष्ट कर दी है कि सहायता और सहयोग तब तक प्रतीक्षा नहीं कर सकते, जब तक कोई महिला अपने सभी विकल्पों से वंचित न हो जाए। समर्थन पहले से मौजूद होना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर वह अकेली न महसूस करे।
समापन में डॉ. तरिता शंकर ने सभी महिलाओं के लिए संदेश दिया,
“अगर आप किसी संघर्ष से गुजर रही हैं, अगर आप डरी हुई हैं, या आपके मन में कोई ऐसा दर्द है जिसे आपने कभी शब्दों में व्यक्त नहीं किया, तो हम आपके साथ हैं। आप अकेली नहीं हैं। अपनी आवाज उठाइए, और आप हमें अपने साथ खड़े पाएंगी। इस परिवार की कोई भी महिला अब अपने संघर्षों का सामना चुप्पी में अकेले नहीं करेगी।”



