
नैतिक आधार के बिना शिक्षा अपने उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकती – प्रो. रघुराज किशोर तिवारी
प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, शासकीय आदर्श विज्ञान महाविद्यालय रीवा में ‘वर्तमान परीक्षा प्रणाली : स्थिति, चुनौतियां एवं समाधान’ विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी आयोजित
रिपोर्ट: अनिल सिंह संवाददाता
स्थान:रीवा मध्य प्रदेश
रीवा। प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, शासकीय आदर्श विज्ञान महाविद्यालय, रीवा (म.प्र.) एवं भारतीय शिक्षण मंडल, महाकौशल प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में बुधवार को ‘वर्तमान परीक्षा प्रणाली : स्थिति, चुनौतियां एवं समाधान’ विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में शिक्षा जगत के विद्वानों, विश्वविद्यालयीन एवं महाविद्यालयीन शिक्षाविदों तथा विद्यार्थियों ने सहभागिता करते हुए वर्तमान परीक्षा प्रणाली की चुनौतियों, उसकी गुणवत्ता, पारदर्शिता, निष्पक्षता एवं सुधार की संभावनाओं पर विस्तार से विचार-विमर्श किया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. रघुराज किशोर तिवारी, प्राध्यापक, जवाहरलाल नेहरू कृषि महाविद्यालय, रीवा एवं सदस्य, राष्ट्रीय शिक्षा नीति क्रियान्वयन, मध्यप्रदेश शासन उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथियों में प्रो. सुरेन्द्र सिंह परिहार, पूर्व कुलसचिव, अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा एवं प्रांत उपाध्यक्ष, भारतीय शिक्षण मंडल, महाकौशल प्रांत तथा प्रो. महेन्द्र मणि द्विवेदी, क्षेत्रीय अतिरिक्त संचालक, उच्च शिक्षा, रीवा संभाग शामिल रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. (डॉ.) रवीन्द्र नाथ तिवारी ने की । कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती के पूजन, दीप प्रज्वलन एवं माल्यार्पण के साथ किया गया। इस अवसर पर महाविद्यालय परिसर में ज्ञान, संस्कृति, भारतीय चिंतन एवं राष्ट्रचेतना का वातावरण निर्मित हुआ। सर्वप्रथम डॉ. प्रियंका जायसवाल द्वारा ध्येय श्लोक का वाचन किया गया तथा इसके पश्चात डॉ. गीतेश्वरी पाण्डेय ने भारतीय शिक्षण मंडल के ध्येय वाक्य का वाचन किया।
अतिथियों के स्वागत उद्बोधन एवं विषय प्रवेश में महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. (डॉ.) रवीन्द्र नाथ तिवारी ने कहा कि वर्तमान समय में शिक्षा व्यवस्था में नैतिक एवं मानवीय मूल्यों की स्थापना अत्यंत आवश्यक है। शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान अथवा परीक्षा में अंक प्राप्त करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें संस्कार, नैतिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व एवं राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध का समावेश भी अनिवार्य है। उन्होने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र मे भारतीय जीवन दृष्टि को पुर्नस्थापित करना भारतीय शिक्षण मंडल का मुख्य उदृेश्य है। अनुसंधान, प्रबोधन, प्रशिक्षण, प्रकाशन एवं संगठन इसके प्रमुख सोपान हैं। भारत-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाकर ही मूल्य आधारित शिक्षा का पुनर्निर्माण एवं शैक्षणिक नवाचार संभव है। आज समाज में विचारों का विखंडन दिखाई दे रहा है, जिसका एक प्रमुख कारण मूल्य आधारित शिक्षा का अभाव है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति भावी पीढ़ी के बौद्धिक, नैतिक एवं सांस्कृतिक विकास की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने भारतीय शिक्षण मंडल के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह संगठन भारतीय संस्कृति, परंपरा एवं ज्ञान परंपरा पर आधारित शिक्षा व्यवस्था के विकास के लिए निरंतर कार्य कर रहा है। ऐसी शिक्षा प्रणाली का निर्माण आवश्यक है, जो भारत को परम वैभव की ओर अग्रसर करते हुए पुनः विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित कर सके।
विशिष्ट अतिथि प्रो. सुरेन्द्र सिंह परिहार ने वर्तमान परीक्षा प्रणाली की व्यावहारिक समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं की विश्वसनीयता विभिन्न कारणों से प्रभावित हुई है। प्रश्नपत्रों की संरचना एवं निर्माण प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता है, ताकि विद्यार्थियों के वास्तविक ज्ञान, समझ एवं विश्लेषणात्मक क्षमता का समुचित आकलन हो सके।
क्षेत्रीय अतिरिक्त संचालक, उच्च शिक्षा प्रो. महेन्द्र मणि द्विवेदी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के निर्माण से लेकर उसके वर्तमान क्रियान्वयन तक की समीक्षा किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मूल उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए उसके क्रियान्वयन की निरंतर समीक्षा आवश्यक है, जिससे विद्यार्थियों को इसका वास्तविक लाभ मिल सके।
मुख्य अतिथि प्रो. रघुराज किशोर तिवारी ने अपने उद्बोधन में शिक्षा के नैतिक एवं सामाजिक पक्ष को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यदि शिक्षा का नैतिक आधार मजबूत नहीं है, तो वह अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि शिक्षा समाज का मूल आधार है और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के केंद्र में शिक्षक की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
उन्होंने विद्यार्थियों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था को विद्यार्थियों के मानसिक, भावनात्मक एवं नैतिक विकास पर भी ध्यान देना होगा। शिक्षक की भूमिका केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समाज एवं राष्ट्र के भविष्य का निर्माता है। उन्होंने प्रेरक विचार व्यक्त करते हुए कहा कि “निर्माण और प्रलय शिक्षक की गोद में पलते हैं।” उनके अनुसार, शिक्षक के विचार, संस्कार एवं कार्यशैली ही आने वाली पीढ़ियों की दिशा निर्धारित करते हैं। इसलिए परीक्षा प्रणाली को केवल विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति जांचने का माध्यम न बनाकर उनके समग्र व्यक्तित्व एवं सृजनात्मक क्षमता के मूल्यांकन का साधन बनाया जाना चाहिए।
संगोष्ठी का प्रमुख आकर्षण पैनल डिस्कशन रहा, जिसमें प्रथम सत्र में शिक्षाविदों की परिचर्चा आयोजित की गई। इसमें प्रो. रवीन्द्र नाथ तिवारी, प्रो. अर्पिता अवस्थी, प्रो. विभा श्रीवास्तव, प्रो. अतुल पाण्डेय, प्रो. उपमा सिंह, प्रो. अंजना सिंह एवं डॉ. श्रवण पाण्डेय ने सहभागिता की, साथ ही जिले के समस्त महाविद्यालयों के प्राचार्य एवं आईक्यूएसी समन्वयक उपस्थित रहे।
परिचर्चा के दौरान वर्तमान परीक्षा प्रणाली की गुणवत्ता, पारदर्शिता एवं निष्पक्षता से जुड़े विभिन्न प्रश्नों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। पैनल के समक्ष सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन की प्रभावशीलता, प्रश्नपत्र निर्माण की प्रक्रिया, उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में पारदर्शिता, विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालयों के बीच बेहतर समन्वय तथा परीक्षा कैलेंडर के समयबद्ध पालन जैसे महत्वपूर्ण विषय रखे गए।
पैनल डिस्कशन के द्वितीय सत्र में विद्यार्थियों की परिचर्चा आयोजित की गई, जिसमें रचित मिश्रा, लक्ष्य गौतम, श्रेया पाण्डेय एवं अनन्या तिवारी ने सहभागिता की। इस सत्र की विशेषता यह रही कि विद्यार्थियों को सीधे शिक्षाविदों एवं विशेषज्ञों के समक्ष अपनी समस्याएं, अनुभव एवं सुझाव रखने का अवसर मिला।
विद्यार्थियों ने आंतरिक मूल्यांकन एवं अपनी अकादमिक प्रगति, ओपन बुक परीक्षा, असाइनमेंट की सार्थकता, समय प्रबंधन, प्रश्नों के उचित चयन, परीक्षा परिणामों में होने वाली विसंगतियों तथा विद्यार्थियों तक डिजिटल अध्ययन सामग्री की पहुंच जैसे महत्वपूर्ण विषय उठाए।
विद्यार्थियों ने परीक्षा से संबंधित अपनी व्यावहारिक कठिनाइयों को साझा करते हुए कहा कि परीक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें विद्यार्थियों को अपनी वास्तविक प्रतिभा एवं योग्यता प्रदर्शित करने का समान अवसर प्राप्त हो। इस परिचर्चा ने यह स्पष्ट किया कि परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए विद्यार्थियों के अनुभवों एवं सुझावों को भी नीति निर्माण एवं शैक्षणिक निर्णयों में उचित स्थान दिया जाना चाहिए।
इस प्रकार संगोष्ठी केवल परीक्षा प्रणाली की समस्याओं पर चर्चा तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें शिक्षाविदों एवं विद्यार्थियों के साझा संवाद के माध्यम से सुधार की संभावनाओं एवं व्यावहारिक समाधानों पर भी गंभीर विमर्श हुआ।
कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. शुभम मिश्रा द्वारा किया गया। कार्यक्रम के अंत में डॉ. स्वाति शुक्ला ने अतिथियों, वक्ताओं, पैनल सदस्यों, भारतीय शिक्षण मंडल के प्रतिनिधियों, महाविद्यालय के प्राध्यापकों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

