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धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद पर आपत्ति उठाना — संविधान से पलायन और मानसिक न्यूनता का प्रतीक : कांग्रेस का तीखा सबाल

धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद पर आपत्ति उठाना — संविधान से पलायन और मानसिक न्यूनता का प्रतीक : कांग्रेस का तीखा सबाल 

 

विविध धर्मों के मतों से सत्ता में आए लोगों द्वारा धर्मनिरपेक्षता पर आपत्ति जताना — यह कृतघ्नता है या मानसिक न्यूनगंड का लक्षण? : कांग्रेस का तीखा सवाल

 

पुणे :राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले द्वारा संविधान में दर्ज “समाजवाद” और “धर्मनिरपेक्षता” जैसे शब्दों पर आपत्ति जताते हुए जो बयान दिया गया है, उस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस के राज्य प्रवक्ता गोपालदादा तिवारी ने कहा कि देश में विविध धर्मों के नागरिकों के मतों से सत्ता में तीसरी बार आने वालों द्वारा इन शब्दों पर आपत्ति करना, देश के अल्पसंख्यक समुदायों — बौद्ध, जैन, ईसाई, मुस्लिम, बोहरा, सिख आदि — के प्रति कृतघ्नता दर्शाता है।

 

उन्होंने कहा कि यह केवल हिंदू धर्म को ही केंद्र में रखने वाली मानसिकता है, जो न सिर्फ संविधान से पलायन करने वाली है बल्कि न्यूनगंड से ग्रसित प्रवृत्ति को भी उजागर करती है।

 

देश के वे तत्व जो विविध धर्मों को अपना नहीं मानते, उनके प्रति सम्मान नहीं रखते और न्याय देने की नीयत नहीं रखते, वही आज विश्वगुरु बनने के सपने देख रहे हैं — यह अत्यंत विडंबनापूर्ण और हास्यास्पद है।

 

गोपालदादा तिवारी ने कहा कि 1942 से 1947 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ जैसी निर्णायक लड़ाई में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कोई भूमिका नहीं रही। देश की आजादी विविध धर्मों के शहीदों, संघर्षरत नेताओं और बलिदानी जनता के त्याग से मिली — यह ऐतिहासिक सच्चाई किसी से छिपी नहीं है।

 

भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु, महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद, सुभाषचंद्र बोस, ख़ान अब्दुल गफ्फार ख़ान आदि विविध धर्मों के नेता अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते रहे, जेल गए, अत्याचार सहे — तभी जाकर भारत को आज़ादी मिली।

 

26 जनवरी 1950 को डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा निर्मित संविधान लागू हुआ, जो एक धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी गणराज्य की नींव रखता है।

 

अब तक देश में कई सरकारें बदलीं — लेकिन किसी भी गैर-कांग्रेसी सरकार ने कभी इन दो शब्दों को हटाने की मांग नहीं की।

 

लेकिन 2014 में सत्ता में आई भाजपा सरकार — जिसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर झूठे आरोपों और खोखले वादों के सहारे जनता को लुभाया — वह आज संवैधानिक जिम्मेदारियों से लगातार भाग रही है।

 

भाजपा और उसकी मातृ संस्था संघ की ओर से धर्म विशेष की सत्ता की वकालत करना, समाज में धार्मिक तनाव पैदा करने वाली बयानबाजी, देश की एकता, सामाजिक सौहार्द और संविधान की भावना को ठेस पहुंचाने वाला कृत्य है।

 

गोपालदादा तिवारी ने पूछा — जब स्वयं संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संविधान के समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष स्वरूप की सार्वजनिक प्रशंसा की है, तो फिर संघ के ही वरिष्ठ पदाधिकारी होसबाले द्वारा इसके विरुद्ध बयान क्यों दिया जा रहा है? क्या यह जानबूझकर जनता में भ्रम और विरोधाभास पैदा करने की कोशिश नहीं है?

 

उन्होंने कहा कि देश की अंतरिक्ष, विज्ञान, कृषि, रक्षा जैसी सफलताओं को देखकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साम्राज्यवादी व पूंजीवादी शक्तियां देश को अस्थिर करने का षड्यंत्र रच रही थीं। उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संविधान के प्रावधानों के अनुसार आपातकाल लागू किया, ताकि देश की सुरक्षा, अखंडता और सार्वजनिक व्यवस्था को बनाए रखा जा सके।

 

गोपालदादा ने कहा कि बैंकों, संस्थानों और देश की संपत्तियों के राष्ट्रीयकरण और भ्रष्ट पूंजीवादी तंत्र से देश को बचाने के लिए संविधान में “समाजवाद” शब्द का समावेश बेहद आवश्यक था।

 

कांग्रेस प्रवक्ता ने स्पष्ट रूप से कहा कि संविधान से “समाजवाद” और “धर्मनिरपेक्षता” शब्द हटाने की मांग न केवल असंवैधानिक है, बल्कि यह सत्ताधारी पार्टी की विफलताओं से ध्यान भटकाने का कुत्सित प्रयास भी है।

 

उन्होंने आरोप लगाया कि देश की सुरक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, महंगाई, किसानों और उद्यमियों की समस्याओं से जूझ रही भाजपा सरकार इन मुद्दों का समाधान नहीं ढूंढ पा रही है, इसलिए धार्मिक भावनाएं भड़काने वाले बयान दिलवाकर जनता को भ्रमित किया जा रहा है।

यह सत्ताधारियों की नैतिक और प्रशासनिक विफलता का प्रमाण है,और संविधान से की जा रही सुनियोजित गद्दारी है।

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