
बिजली विभाग: आदेश की जूती और भ्रष्टाचार की मलाई,बिजली विभाग या बेलगाम माफिया? मंत्री की चेतावनी, अफसरों की बेशर्मी और जनता की बदहाली
संपादकीय हकीकत, बेखौफ रिपोर्टिंग
उत्तर प्रदेश में बिजली विभाग अब महज़ एक तकनीकी महकमा नहीं, बल्कि एक बेलगाम सत्ता बन चुका है — जो न तो मुख्यमंत्री की सुनता है, न ऊर्जा मंत्री की। मंत्री आदेश दें, चेतावनी दें या यहां तक कि तीर चलाने की धमकी दें — अफसरों पर कोई असर नहीं। ये विभाग नहीं, बिजली माफिया का अड्डा बन चुका है।
ऊर्जा मंत्री एके शर्मा के दो तीखे वीडियो वायरल हो चुके हैं। उनमें उनकी नाराज़गी की झलक नहीं, पूरी व्यवस्था के प्रति गुस्से का विस्फोट है। जब एक जिम्मेदार मंत्री यह कहे —
ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव आशीष गोयल, जिन पर मंत्री के आदेशों की अनदेखी और विभागीय शिथिलता के आरोप हैं।
“ऐसा तीर छोड़ूंगा कि न घर के रहोगे, न घाट के, न राज्य के और न दिल्ली के”
— तो समझ लीजिए कि भीतर कितना गुस्सा और विवशता भरी पड़ी है।
पर क्या फर्क पड़ता है?
ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव आशीष गोयल जैसे अधिकारी इन बातों को सुनने के लिए नहीं बने। उनके लिए मंत्री के आदेश महज़ ध्वनि प्रदूषण हैं। न जवाब देना, न कार्रवाई करनी — बस कुर्सी पर जमे रहना और मलाई काटते रहना।
ग्राउंड ज़ीरो की हकीकत
प्रदेश के कई ज़िलों से रोज़ आ रही शिकायतें इस भ्रष्टाचार की ज़िंदा मिसाल हैं। कहीं ट्रांसफॉर्मर छह महीने से जला पड़ा है, तो कहीं लाइनमैन 2,000 रुपए लेकर ही कनेक्शन देता है। जुलाई 2025 में ही प्रयागराज, बलिया, मैनपुरी और गोरखपुर जैसे जिलों से 13,000 से अधिक उपभोक्ता शिकायतें दर्ज हुईं — जिनमें से 75% पर कोई समाधान नहीं हुआ। सवाल उठता है कि क्या यह विभाग सिर्फ रिपोर्टिंग की खानापूरी के लिए है?
वित्तीय लीक भी कम नहीं
2023-24 की नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) रिपोर्ट के अनुसार यूपी पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) की बिजली खरीद और वितरण में ₹5,432 करोड़ का ‘अनुत्पादक व्यय’ दर्ज किया गया — यानी सरकारी धन की बर्बादी। यह विभाग सिर्फ बिजली नहीं जला रहा, यह जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई को भी राख बना रहा है।
यह कोई पहली बार नहीं है। इस विभाग की जड़ों में ही भ्रष्टाचार, रिश्वत और राजनीतिक संरक्षण की दीमक लगी हुई है। सरकारें बदलीं, चेहरे बदले, पर विभाग नहीं बदला। ट्रांसफॉर्मर से लेकर टेंडर तक, ठेके से लेकर ट्रिपिंग तक — हर जगह “खेल” चलता रहा है।
ऊर्जा मंत्री एके शर्मा ने दो बार बैठकों की — लेकिन नतीजा वही निकला जो हमेशा निकलता है: “हां सर, देख रहे हैं”।
आख़िरकार जब हालात बेकाबू हो गए, तो खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सख्त हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा:
“बिजली व्यवस्था ठीक होनी चाहिए, वरना खैर नहीं!”
लेकिन सवाल ये है — जब मंत्री का आदेश भी ठोकर में, मुख्यमंत्री की चेतावनी भी अनसुनी — तब इस ‘बिजलीतंत्र’ को कौन झुका सकता है?
ऊर्जा विभाग अब वनिया की दुकान की तरह चल रहा है — जहां खरीद-फरोख्त खुलेआम होती है, और ज़िम्मेदारी नाम की कोई चीज़ नहीं। लाइनमैन से लेकर अधीक्षण अभियंता तक — सब अपने-अपने “कट” में व्यस्त हैं, और ऊपर आशीष गोयल जैसों की मौन सहमति इस सिस्टम की असली ताक़त है।
अब वक्त आ गया है — सिर्फ बयान नहीं, बलिदान चाहिए। उन अफसरों की कुर्सियां अब हिलनी चाहिए जो सरकार की साख को चौराहे पर नंगा कर रहे हैं।
क्योंकि ये सिर्फ बिजली की लड़ाई नहीं है — यह भरोसे और बदनामी के बीच की जंग है।



