
मुख्यमंत्री कार्यालय में दब गई जनता की आवाज़
शिकायतें न आईजीआरएस पोर्टल पर दर्ज, न कोई जवाब
लखनऊ/विशाल समाचार
सरकार भले ही जनसुनवाई और पारदर्शिता के बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। मुख्यमंत्री कार्यालय तक भेजी गईं शिकायतें भी आज तक अनसुनी हैं।
शिकायतकर्ता ने 11 जुलाई 2025 और 03 सितम्बर 2025 को क्रमशः दो पत्र मुख्यमंत्री कार्यालय भेजे थे। लेकिन दो महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी न तो इन शिकायतों को आईजीआरएस पोर्टल पर दर्ज किया गया और न ही किसी प्रकार का जवाब दिया गया।
बार-बार फोन लगाया, किसी ने नहीं उठाया
शिकायतकर्ता का कहना है कि मुख्यमंत्री कार्यालय की लाइन पर लगातार कॉल करने की कोशिश की गई। हर दो–तीन दिन बाद फोन लगाया गया, लेकिन आज तक किसी ने कॉल रिसीव नहीं किया। कई बार लगातार डायल करने के बाद भी फोन उठाना तो दूर, कोई प्रतिक्रिया तक नहीं दी गई।
पहले भी प्रकाशित हुई थी शिकायत
इससे पहले शिकायतकर्ता द्वारा भेजे गए पत्रों को अखबार और पोर्टल दोनों पर प्रकाशित किया जा चुका है। बावजूद इसके मुख्यमंत्री कार्यालय ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया। इससे साफ है कि जनता की सीधी आवाज़ भी सत्ता के गलियारों तक पहुँचकर दम तोड़ देती है।
जनता के सवाल:
जब मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुँची शिकायतों का यही हाल है तो आम जनता कहाँ जाए?
क्या शिकायतें केवल कागज़ी खानापूरी के लिए ली जाती हैं?
मुख्यमंत्री कार्यालय का फोन लगातार न उठना क्या जनता के प्रति असंवेदनशीलता नहीं है?
प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल:जनता को उम्मीद रहती है कि मुख्यमंत्री कार्यालय उनकी अंतिम सुनवाई का मंच है। लेकिन शिकायतें दबा दी जाएँ, जवाब न दिया जाए और फोन तक न उठाया जाए तो यह सीधे-सीधे जनता के भरोसे से खिलवाड़ है।
“मुख्यमंत्री कार्यालय का फोन मौन – शिकायतकर्ता की पुकार अनसुनी”

