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मुख्य न्यायाधीश को ‘निवड समिति’ से बाहर करने का कारण सत्ता पक्ष बताए, तभी राहुल जी पर टिप्पणी करें : गोपालदादा तिवारी (कांग्रेस)

मुख्य न्यायाधीश को ‘निवड समिति से बाहर करने का कारण सत्ता पक्ष बताए, तभी राहुल जी पर टिप्पणी करें : गोपालदादा तिवारी (कांग्रेस)

 

विशाल समाचार | पुणे

 

मुख्य न्यायाधीश के शपथ ग्रहण समारोह में उपस्थित न रहने के कारण भाजपा नेताओं ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर “न्यायपालिका और संविधान का अनादर” करने का तथ्यहीन और हास्यास्पद आरोप लगाया है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता गोपालदादा तिवारी ने कहा कि सत्ताधारी नेता पहले स्वयं यह आत्मचिंतन करें कि वे न्यायपालिका और विपक्ष के नेता का कितना सम्मान करते हैं, तभी ऐसी आलोचना करने का नैतिक अधिकार रखते हैं।

 

गोपालदादा तिवारी ने बताया कि इससे पहले के कई मुख्य न्यायमूर्तियों के शपथ ग्रहण समारोह में राहुल गांधी नियमित रूप से उपस्थित रहे हैं। इस बार कुछ व्यक्तिगत कारणों से वे उपस्थित न हो सके होंगे—परंतु उनकी अनुपस्थिति का राजनीतिकरण करना अनुचित है।

 

उन्होंने आगे कहा कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव माने जाने वाले मुख्य चुनाव आयोग की नियुक्ति करने वाली “तीन सदस्यीय चयन समिति”—

 

1. प्रधानमंत्री, 2विपक्ष के नेता,3. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (न्यायपालिका के प्रतिनिधि के रूप में)—इस समिति से ‘मुख्य न्यायाधीश’ को बाहर कर दिया गया, जबकि प्रधानमंत्री स्वयं सत्ता पक्ष से हैं। इसके बावजूद गृहमंत्री अमित शाह को समिति में क्यों शामिल किया गया? इसका जवाब सत्ता पक्ष को देना चाहिए, तभी उन्हें राहुल गांधी पर टिप्पणी करने का अधिकार है।

कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि यह विधेयक पारित करते समय सत्ताधारी दल ने लोकतांत्रिक परंपराओं को किनारे रखते हुए, संसदीय चर्चा की अनदेखी की, सैकड़ों सांसदों को मनमाने ढंग से निलंबित किया और हुकूमशाही तरीके से कानून पारित कराया। इसके बाद चुनाव आयोग में ऐसे अधिकारी की नियुक्ति की गई, जो गृहमंत्री के ही विभाग में सचिव के पद पर काम कर चुका था—जिससे चुनाव प्रणाली पर कब्जा जमाने का प्रयास स्पष्ट दिखाई देता है। ऐसे में जनता के लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों की खुली अवहेलना करने वालों को विपक्ष के नेता पर सवाल उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

 

अंत में गोपालदादा तिवारी ने कहा कि संविधान ने न्यायपालिका को यह अधिकार दिया है कि वह “संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण” से जुड़ी सार्वजनिक महत्व की किसी भी बात पर स्वयं संज्ञान (सुओ-मोटो) ले सकती है—और जनता को न्यायपालिका से यही अपेक्षा है।

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