
यूजीसी के इक्विटी नियम सामाजिक न्याय के लिए आवश्यक, स्थगन दुर्भाग्यपूर्ण:— डॉ. हुलगेश चलवादी
पुणे;विशाल समाचार
उच्च शिक्षण संस्थानों में धर्म, जाति, लिंग और सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा घोषित यूजीसी (प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन) रेगुलेशंस 2026 ऐतिहासिक और सामाजिक न्याय की दिशा में उठाया गया एक साहसिक कदम है। हालांकि इन प्रगतिशील नियमों पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अस्थायी रोक लगाए जाने को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए माजी नगरसेवक डॉ. हुलगेश चलवादी ने कहा कि इससे वंचित और पिछड़े वर्गों के विद्यार्थियों की उम्मीदों को तात्कालिक झटका लगा है।
डॉ. चलवादी ने कहा कि देश का संविधान समानता की गारंटी देता है, लेकिन इसके बावजूद आज भी शिक्षण संस्थानों में भेदभाव की घटनाएं सामने आती हैं, इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता। यूजीसी के नए इक्विटी नियम केवल प्रशासनिक सुधार नहीं हैं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों को व्यवहार में उतारने का एक गंभीर प्रयास हैं। ऐसे नियमों का विरोध करना अप्रत्यक्ष रूप से भेदभावपूर्ण व्यवस्था को संरक्षण देने जैसा है।
उन्होंने बताया कि नए नियमों के तहत प्रत्येक विश्वविद्यालय और महाविद्यालय में स्वतंत्र शिकायत निवारण प्रकोष्ठ की स्थापना, प्रवेश प्रक्रिया तथा छात्रावासों में कक्ष आवंटन में पूर्ण पारदर्शिता अनिवार्य की गई है। साथ ही नियमों के उल्लंघन पर संबंधित संस्थानों की सरकारी सहायता रोके जाने और भारी जुर्माना लगाए जाने का प्रावधान भी किया गया है। डॉ. चलवादी ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान भले ही कुछ लोगों को कठोर प्रतीत हो, लेकिन अन्याय का सामना कर रहे विद्यार्थियों के लिए यही सबसे बड़ी सुरक्षा है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2012 के पुराने नियम वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में अप्रासंगिक हो चुके थे। बदलते सामाजिक यथार्थ को देखते हुए अधिक कठोर, स्पष्ट और प्रभावी कानूनी ढांचे की आवश्यकता थी, जिसे यूजीसी ने प्रस्तुत किया है। लेकिन समानता के विचार से असहमत कुछ शक्तियों द्वारा इन नियमों को न्यायालय में चुनौती देना चिंता का विषय है।
डॉ. चलवादी ने विश्वास जताया कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई रोक अस्थायी है और अंतिम निर्णय में न्यायालय संवैधानिक मूल्यों के पक्ष में निर्णय देगा तथा ये नियम पुनः लागू होंगे। उन्होंने केंद्र सरकार और यूजीसी से अपील की कि शिक्षा क्षेत्र में समान अवसर, सुरक्षित वातावरण और भयमुक्त कैंपस सुनिश्चित करने के लिए इन नियमों पर दृढ़ता से कायम रहते हुए न्यायालय में प्रभावी पक्ष रखा जाए।

