महाराष्ट्र की राजनीति में स्वाभिमान, संवेदना और शिष्टाचार जरूरी: विठ्ठल राजे पवार
रिपोर्ट: विशाल समाचार संवाददाता
स्थान : पुणे महाराष्ट्र
दिनांक: 1 फरवरी 2026
शरद जोशी विचारमंच शेतकरी संघटना महासंघ (महाराष्ट्र) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं निमंत्रक विठ्ठल राजे पवार ने महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र की राजनीति की परंपरा स्वाभिमान, सामाजिक संवेदना और राजनीतिक शिष्टाचार पर आधारित रही है, जिसे किसी भी परिस्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
पवार ने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज की स्वराज्य संकल्पना से लेकर आधुनिक लोकतंत्र तक, महाराष्ट्र ने हमेशा जनहित और सामाजिक जिम्मेदारी को प्राथमिकता दी है। ऐसे में राज्य की जनता यह अपेक्षा रखती है कि राजनीतिक नेतृत्व जनभावनाओं का सम्मान करे और महाराष्ट्रधर्म का पालन करे।
उन्होंने हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों का जिक्र करते हुए विशेष रूप से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में हुई गतिविधियों पर सवाल उठाए। पवार के अनुसार, निर्णय प्रक्रिया में जल्दबाजी, परंपराओं की अनदेखी और राजनीतिक शिष्टाचार की कमी से कार्यकर्ताओं और आम जनता में असंतोष पैदा हुआ है।
विठ्ठल राजे पवार ने अजित पवार के आकस्मिक निधन को महाराष्ट्र की राजनीति के लिए बड़ी क्षति बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे संवेदनशील समय में संयम और सामाजिक मर्यादाओं का पालन आवश्यक था, लेकिन उपमुख्यमंत्री पद को लेकर दिखाई गई जल्दबाजी कई लोगों को अनुचित लगी।
उन्होंने स्पष्ट किया कि माननीय सांसद सुनेत्रा अजित पवार के नेतृत्व और सम्मान पर किसी प्रकार का प्रश्न नहीं है। उनका कहना था कि मुद्दा व्यक्ति का नहीं, बल्कि समय, पद्धति और राजनीतिक संवेदनशीलता का है।
पवार ने आरोप लगाया कि शोककाल और पारिवारिक परंपराओं की अनदेखी करते हुए शपथविधि की जल्दबाजी महाराष्ट्र की राजनीतिक संस्कृति के विपरीत है। उन्होंने कहा कि राजनीति केवल सत्ता का गणित नहीं होती, बल्कि उसमें नैतिकता, संवेदना और कार्यकर्ताओं की भावनाओं का भी उतना ही महत्व होता है।
उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी राजनीतिक दल कुछ व्यक्तियों की निजी जागीर नहीं होता। यदि कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की गई, तो पार्टी की जड़ें कमजोर हो जाती हैं। उन्होंने नेतृत्व से आत्मचिंतन करने की अपील की।
विठ्ठल राजे पवार ने कहा कि उपमुख्यमंत्री पद या वित्त जैसे महत्वपूर्ण विभागों से जुड़े फैसले धैर्य और सामूहिक विचार-विमर्श से लिए जाने चाहिए थे। उन्होंने दोहराया कि राजनीति सेवा का माध्यम होनी चाहिए, न कि केवल सत्ता प्राप्ति का।
अंत में उन्होंने कहा कि सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन जनता का विश्वास, पार्टी की प्रतिष्ठा और महाराष्ट्र की राजनीतिक संस्कृति को बचाए रखना हर जिम्मेदार नेता का नैतिक दायित्व है।

