
बांबू उद्योग के विकास के लिए सहकार क्षेत्र का सहयोग जरूरी
पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु की राय; ‘आईएमडीआर’ द्वारा आयोजित दो दिवसीय ‘बांबूकॉन’ प्रदर्शनी का समापन
रिपोर्ट: विशाल समाचार
स्थान: पुणे महाराष्ट्र
पुणे: ग्रामीण अर्थव्यवस्था में परिवर्तन लाने की क्षमता रखने वाला बांबू एक जादुई फसल है और इसे केवल खेती नहीं, बल्कि एक टिकाऊ उद्योग के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि इस उद्योग को सहकार क्षेत्र और संस्थागत नीतियों का सहयोग मिले, तो बांबू उद्योग तेजी से विकसित हो सकता है, यह राय पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु ने दी।
वे डेक्कन एज्युकेशन सोसायटी संचालित इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट डेवलपमेंट एंड रिसर्च (आईएमडीआर) में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन और ‘बांबूकॉन’ प्रदर्शनी के समापन समारोह में बोल रहे थे। सम्मेलन का विषय ‘सहकार आंदोलन में बांबू : स्थिरता और समृद्धि की दिशा’ तथा ‘डेटा आधारित नेतृत्व : रणनीति, नवाचार और प्रभाव’ था। इस अवसर पर संस्थान के पदाधिकारी, प्राध्यापक, कर्मचारी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित थे। प्रभु ने प्रदर्शनी का अवलोकन कर बांबू उत्पाद निर्माताओं की सराहना की और विद्यार्थियों से संवाद भी किया।
प्रभु ने कहा कि वर्ष 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में पर्यावरण मंत्री रहते हुए उन्होंने देश में पहली बार बांबू की खेती को बढ़ावा देने की पहल की थी। उन्होंने कहा कि बांबू में देश की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण दोनों को बदलने की क्षमता है।
उन्होंने बताया कि भारत में लगभग 80 से 90 प्रतिशत लोग किसी न किसी रूप में सहकार से जुड़े हैं और सहकार क्षेत्र की कई सफल कहानियां मौजूद हैं। महाराष्ट्र में सहकार के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक प्रगति के कई उदाहरण देखने को मिलते हैं। सहकार के कारण गन्ना किसानों की आय बढ़ी है। इसी तरह हिमाचल प्रदेश में सेब उत्पादन और अमूल जैसे ब्रांड का निर्माण सहकार मॉडल की सफलता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि इन्हीं सफल प्रयोगों की तरह बांबू क्षेत्र में भी सहकार आधारित मॉडल विकसित करने की जरूरत है।

प्रभु ने कहा कि बांबू केवल एक फसल नहीं, बल्कि भविष्य का एक बड़ा उद्योग है। ग्रामीण क्षेत्रों और किसानों की आय में बदलाव लाने की क्षमता सहकार क्षेत्र में है। उन्होंने कहा कि जहां गन्ने की खेती का मिट्टी और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, वहीं बांबू के सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलते हैं। बांबू के उपयोग से कार्बन उत्सर्जन कम करने में भी मदद मिलती है और यह हरित अर्थव्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
उन्होंने कहा कि सहकार से उत्पन्न संपत्ति सीधे सदस्यों के पास पहुंचती है, जो इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। यदि सहकारी संस्थाओं के माध्यम से बांबू से बेहतर डिजाइन और उत्पाद विकसित किए जाएं, तो उनका विपणन, बिक्री और निर्यात संभव है, जिससे किसानों को आर्थिक लाभ मिल सकता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सहकार क्षेत्र बांबू उद्योग के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है।


