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वनाधिकार के सामुदायिक दावों के निराकरण में आएगी तेजी – कमिश्नर

वनाधिकार के सामुदायिक दावों के निराकरण में आएगी तेजी – कमिश्नर

वनों के उपयोग के साथ इसके प्रबंधन और संरक्षण की भी है जिम्मेदारी – श्री लेले

रिपोर्ट :विशाल समाचार 

स्थान: रीवा मध्य प्रदेश

रीवा . जनजातीय कार्य विभाग द्वारा कमिश्नर कार्यालय सभागार में वनाधिकार अधिनियम की एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में रीवा संभाग के कमिश्नर बीएस जामोद ने कहा कि वनाधिकार अधिनियम के तहत व्यक्तिगत दावे बड़ी संख्या में मान्य किए गए हैं। सामुदायिक दावों के संबंध में राजस्व तथा वन विभाग के अधिकारियों के मन में कई शंकाएं थीं। कार्यशाला में दी गई तथ्यपूर्ण जानकारियों से सभी भ्रांतियाँ दूर हो गई हैं। सामुदायिक वनाधिकार दावे वनों के उपयोग के साथ-साथ इनकी सुरक्षा और संवर्धन का उत्तरदायित्व भी देते हैं। अब सामुदायिक दावों के निराकरण में तेजी आएगी।

कार्यशाला में प्रशिक्षण देते हुए बंगलौर से आए मास्टर ट्रेनर तथा विषय विशेषज्ञ शरद लेले ने कहा कि वनों में परंपरागत रूप से रहने वाले निवासियों को वन में निस्तार करने की सुविधा तथा वनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी मिली हुई थी। अंग्रेजी शासनकाल में वनों से जुड़े एक्ट बनाकर वनवासियों के अधिकारों का हनन किया गया। वनाधिकार अधिनियम ने वनों में रहने वाले परंपरागत निवासियों को पुन: उनके अधिकार प्रदान किए। यह एक्ट वनवासियों के व्यक्तिगत और सामुदायिक दावों को मान्यता देने का एक्ट है। सामुदायिक दावे में वनों के विदोहन और उपयोग के साथ-साथ वनों के संरक्षण, संवर्धन और प्रबंधन की जिम्मेदारी जुड़ी है। सामुदायिक दावों में मुख्य रूप से वन क्षेत्र में स्थित पूजा स्थलों तक परंपरागत मार्ग से जाने और पूजा करने तथा वन क्षेत्र के जलाशयों में मछली पकड़ने के अधिकार शामिल हैं। वन क्षेत्र में आंगनवाड़ी भवन, स्कूल भवन, पानी की टंकी तथा अस्पताल के निर्माण का भी प्रावधान है। इसके साथ-साथ वनों में गिरी पड़ी लकड़ी को एकत्रित करने, महुआ, चिंरौजी तथा तेंदूपत्ता जैसे वनोपज के संग्रहण का भी अधिकार दिया गया है।

श्री लेले ने कहा कि वनाधिकार अधिनियम में सभी राष्ट्रीय उद्यान, अभ्यारण्य, संरक्षित वन क्षेत्र तथा सामान्य वन क्षेत्र शामिल हैं। वन ग्रामों में भी इसके प्रावधान लागू होते हैं। सामुदायिक दावे सबसे पहले ग्राम स्तरीय वनाधिकार समिति में दर्ज किए जाएं। इसमें पटवारी और वन विभाग के बीटगार्ड केवल भूमि के संबंध में ही अभिमत दें। परंपरागत वनों के क्षेत्र का निर्धारण गांव तथा आसपास के अन्य गांवों के बुजुर्गों से जानकारी लेकर साक्ष्य तैयार किए जाएं। सामुदायिक दावे ग्राम सभा में पारित होकर खण्ड स्तरीय वनाधिकार समिति को भेजे जाएं। खण्ड स्तरीय समिति इसका परीक्षण करे तथा किसी भी तरह की कमी पाए जाने पर उसे पुन: ग्राम सभा को भेज सकती है। सामुदायिक दावे ठीक पाए जाने पर खण्ड स्तरीय समिति अनुमोदन के लिए जिला स्तरीय समिति को भेजे। खण्ड स्तरीय समिति को दावा अमान्य करने का अधिकार नहीं है। जिला स्तरीय समिति समुदाय को पूरी जानकारी देकर दावे में अंतिम रूप से निर्णय करेगी।

कार्यशाला में बताया गया कि परंपरागत वनवासियों के लिए सामुदायिक दावे के रूप में मुक्तिधाम तथा देवस्थान तक जाने के अधिकार मान्य होंगे। कार्यशाला में वनकर्मियों के प्रशिक्षण, राजस्व तथा वनभूमि क्षेत्र निर्धारण, वनों की सुरक्षा के उपाय तथा सामुदायिक दावों निराकरण के संबंध में विस्तार से चर्चा की गई। कार्यशाला में उपायुक्त जनजातीय कार्य जेपी यादव ने वनाधिकार अधिनियम के प्रावधानों तथा कार्यशाला के उद्देश्यों की जानकारी दी। संयुक्त आयुक्त जनजातीय कार्य भोपाल केके पवैया ने व्यक्तिगत तथा सामुदायिक दावों के प्रक्रिया की जानकारी दी। कार्यशाला में कलेक्टर सतना सतीश कुमार एस, कलेक्टर मऊगंज संजय कुमार जैन, कलेक्टर सीधी विकास मिश्रा तथा वन मण्डलाधिकारी रीवा लोकेश निरापुरे ने उपयोगी सुझाव दिए। कार्यशाला में सीसीएफ रीवा अनुराग कुमार, मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत रीवा मेहताब सिंह गुर्जर, अपर कलेक्टर रीवा श्रीमती सपना त्रिपाठी, संभाग के सभी जिलों के वन मण्डलाधिकारी, सीईओ जिला पंचायत, सहायक आयुक्त आदिवासी विकास तथा एसडीएम एवं एसडीओ वन शामिल रहे। सिंगरौली जिले के कलेक्टर गौरव बैनल तथा अन्य अधिकारी वीडियो कान्फ्रेंसिंग से कार्यशाला में शामिल हुए।

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