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कहां चला गया पुलिस के हाथों में लहराने वाला डंडा

कहां चला गया पुलिस के हाथों में लहराने वाला डंडा

 

रिपोर्ट: विशाल समाचार 

स्थान:लखनऊ, उत्तर प्रदेश 

 

उत्तर प्रदेश की सड़कों पर वर्षों तक एक दृश्य बेहद सामान्य हुआ करता था, जो अब केवल पुरानी यादों या पुलिस थानों की धूल फांकती फाइलों में सिमट कर रह गया है। खाकी वर्दी पहने एक पुलिस कर्मी, जिसके हाथ में एक लंबी, मजबूत और पॉलिश की हुई बेंत की लाठी होती थी, जिसे स्थानीय भाषा में हम डंडा कहते हैं। वह डंडा केवल पुलिस की वर्दी का एक अनिवार्य अंग मात्र नहीं था, बल्कि वह उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था का वह आधार स्तंभ था, जो बड़े से बड़े मनचलों और अराजक तत्वों को केवल अपनी मौजूदगी से ही अनुशासित कर देता था। एक समय था जब चौराहों पर ट्रैफिक नियंत्रित करते हुए या भीड़ भरे इलाकों में गश्त करते हुए पुलिस वाले के हाथ का वह डंडा किसी भी विवाद को पल भर में शांत करने के लिए पर्याप्त होता था। उस डंडे के प्रति अपराधियों के मन में एक स्वाभाविक और गहरा खौफ था, जो उन्हें कानून की लक्ष्मण रेखा लाँघने से पहले सोचने पर मजबूर कर देता था। लोग कहते हैं कि वह डंडा केवल लकड़ी का टुकड़ा नहीं, बल्कि राज्य के इकबाल और कानून के शासन का प्रतीक था। जब कोई उपद्रवी या अपराधी सड़क पर कानून को अपने हाथ में लेने की कोशिश करता, तो पुलिस वाले के हाथ का वह डंडा एक मूक चेतावनी की तरह काम करता था। उस दौर में पुलिस को किसी भी स्थिति को संभालने के लिए हथियारों के प्रयोग या बल की अधिक आवश्यकता नहीं पड़ती थी, क्योंकि वह डंडा एक मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में सक्षम था। पुलिस कर्मियों के लिए वह डंडा उनकी सुरक्षा कवच भी था और उनके काम का अभिन्न साथी भी।

 

लेकिन समय के साथ स्थितियां बदलने लगीं और पुलिस के हाथों से यह डंडा धीरे-धीरे गायब होने लगा। इस बदलाव के पीछे कई जटिल कारण हैं, जिसमें मानवाधिकार संगठनों की बढ़ती सक्रियता और न्यायपालिका की सख्त होती टिप्पणियां प्रमुख हैं। बीते कुछ दशकों में मानवाधिकारों के प्रति वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता बढ़ी है, जिसका परिणाम यह हुआ कि पुलिस के हर कदम की बारीकी से जांच होने लगी। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने तर्क दिया कि पुलिस के हाथ में लाठी का होना अनियंत्रित बल के प्रयोग को बढ़ावा देता है, जिससे नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हो सकता है। उनके अनुसार, सभ्य समाज में पुलिस को डंडे के बल पर नहीं, बल्कि कानून के तर्क और तकनीकी कौशल के आधार पर काम करना चाहिए। इसके साथ ही, न्यायपालिका ने भी अपने विभिन्न निर्णयों में पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए और यह स्पष्ट किया कि बल का प्रयोग केवल अंतिम विकल्प के रूप में ही किया जाना चाहिए। पुलिस द्वारा किसी भी प्रकार के शारीरिक बल के इस्तेमाल पर कोर्ट की निगरानी और मीडिया की पैनी नजर ने पुलिस कर्मियों को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया। इन परिस्थितियों ने उत्तर प्रदेश की पुलिस के भीतर एक तरह का डर पैदा कर दिया कि कहीं उनका कोई छोटा सा कदम, जो ड्यूटी के नाते आवश्यक था, उनके लिए कानूनी मुसीबत या निलंबन का कारण न बन जाए। धीरे-धीरे, पुलिस ने खुद को विवादों से बचाने के लिए अपने हाथ से वह डंडा छोड़ देना ही बेहतर समझा।

 

आज स्थिति यह है कि सड़क पर कानून-व्यवस्था संभालने वाले हमारे पुलिस कर्मी एक अजीब सी लाचारी के दौर से गुजर रहे हैं। बिना डंडे के, वे उन उपद्रवियों और मनचलों के सामने निहत्थे से महसूस होते हैं, जो कानून का सम्मान करने के बजाय पुलिस के संयम को उनकी कमजोरी समझने लगे हैं। जब पुलिस कर्मी के हाथ में डंडा नहीं होता, तो अराजक तत्वों का मनोबल बढ़ता है क्योंकि उन्हें पता होता है कि सामने खड़ा पुलिस वाला कानूनी पचड़ों के डर से हाथ नहीं उठा सकता। यह लाचारी केवल पुलिस कर्मियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आम जनता के लिए भी एक चिंता का विषय है। अक्सर देखा गया है कि छेड़खानी के मामलों में, छोटी-मोटी मारपीट या दंगों जैसी स्थितियों में पुलिस के हाथ में मौजूद वह डंडा ही था, जो फौरन शांति स्थापित कर देता था। अब उसके न होने से पुलिस को भीड़ को नियंत्रित करने के लिए वैकल्पिक तरीकों जैसे आंसू गैस के गोले, लाठीचार्ज के बड़े ऑपरेशन्स या अन्य बल प्रयोगों का सहारा लेना पड़ता है, जिसमें समय भी अधिक लगता है और जनहानि का खतरा भी बढ़ जाता है। डंडे के जरिए जो काम एक पल में हो जाता था, आज उसी के लिए पुलिस को लंबी प्रशासनिक प्रक्रियाओं और बल प्रयोग के आरोपों का सामना करना पड़ता है।

 

पुलिस के हाथ से डंडा छिन जाने का मतलब केवल एक उपकरण का जाना नहीं है, बल्कि यह राज्य के इकबाल और सड़क पर पुलिस की उपस्थिति के प्रभाव में आई कमी का द्योतक है। खाकी और डंडे का जो समन्वय दशकों से चला आ रहा था, उसके टूटने से पुलिस के आत्मविश्वास पर भी असर पड़ा है। आज का पुलिस कर्मी इस दुविधा में जीता है कि वह कानून का पालन कैसे कराए, जबकि उसके पास उस डंडे का संरक्षण नहीं है, जो बिना किसी को नुकसान पहुँचाए ही अनुशासन कायम कर देता था। न्यायपालिका और मानवाधिकारों का सम्मान करना निस्संदेह आवश्यक है और पुलिस का निरंकुश होना किसी भी लोकतंत्र में स्वीकार्य नहीं है, लेकिन इस प्रक्रिया में उस माध्यम को पूरी तरह खत्म कर देना, जो शांति व्यवस्था बनाए रखने में सबसे अधिक प्रभावी था, एक विचारणीय प्रश्न है। क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ पुलिस को तकनीकी और आधुनिक उपकरणों के नाम पर इतना सीमित कर दिया जाएगा कि वह सड़क पर कानून की धज्जियां उड़ाने वालों के सामने असहाय दिखेगी? समाज में अनुशासन बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि पुलिस को उचित कानूनी सुरक्षा और संसाधन मिले, ताकि वह बिना किसी अनावश्यक भय के अपना कर्तव्य निभा सके।

 

बहरहाल, डंडे के बिना पुलिस का सड़क पर होना ऐसा ही है जैसे किसी सिपाही का बिना ढाल के युद्ध के मैदान में उतरना। आने वाले समय में नीति निर्माताओं को यह सोचना होगा कि कानून के शासन और मानवाधिकारों के बीच एक संतुलन कैसे बनाया जाए, ताकि पुलिस के हाथ का वह ‘प्रतीकात्मक डंडा’ फिर से अपनी गरिमा और प्रभाव के साथ वापस लौट सके, जो अपराधियों के मन में डर और आम नागरिकों के मन में सुरक्षा का भाव पैदा करता था। पुलिस की इस लाचारी को खत्म करना केवल पुलिस कर्मियों के मनोबल के लिए ही नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और अनुशासित समाज के लिए भी अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि कानून का इकबाल बना रहेगा तभी समाज में व्यवस्था का कायम रहना संभव हो सकेगा।

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