
सोशल मीडिया पर जातिगत टिप्पणी से उठे सवाल, पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर नजर
रिपोर्ट :विशाल समाचार संवाददाता
स्थान:दतिया इंदरगढ़ मध्य प्रदेश
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इसको भूल कर डिलीट नहीं करना
दतिया/इंदरगढ़। सोशल मीडिया पर सामने आई एक पोस्ट को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। इंदरगढ़, दतिया निवासी राजकुमार जाटव के फेसबुक अकाउंट से दो दिन पहले साझा की गई पोस्ट में आरक्षण और जातिगत पहचान को लेकर ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया गया है, जिसे सामाजिक रूप से आपत्तिजनक और विभाजनकारी माना जा सकता है।
पोस्ट में लिखा गया है— “जब तक दुबे जी जूता पॉलिश नहीं करेगा और जाटव जी शंकराचार्य नहीं बन जाते, तब तक आरक्षण जारी रहेगा।” पोस्ट के साथ एक महिला की तस्वीर भी लगाई गई है।
इस पोस्ट के सामने आने के बाद सवाल उठ रहा है कि सोशल मीडिया के माध्यम से समाज में जातिगत आधार पर इस तरह की टिप्पणियों को बढ़ावा देने की कोशिशों पर पुलिस और प्रशासन की नजर है या नहीं।
मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि सोशल मीडिया पर लिखी गई ऐसी टिप्पणियां तेजी से लोगों तक पहुंचती हैं और सामाजिक सौहार्द को प्रभावित कर सकती हैं। किसी भी समुदाय, जाति या वर्ग को लेकर अपमानजनक टिप्पणी किए जाने की स्थिति में कानून के अनुसार उसकी जांच किया जाना आवश्यक है।
दतिया पुलिस और साइबर सेल से मांग है कि संबंधित फेसबुक अकाउंट और पोस्ट की निष्पक्ष जांच की जाए। पोस्ट कब और किस उद्देश्य से साझा की गई, इसे कितने लोगों तक प्रसारित किया गया तथा क्या इससे सामाजिक वैमनस्य फैलाने का प्रयास हुआ—इन सभी पहलुओं की जांच होनी चाहिए।
सवाल यह भी है कि सोशल मीडिया पर इस तरह की सामग्री सार्वजनिक रूप से प्रसारित होने के बावजूद संबंधित प्रशासनिक और साइबर तंत्र इसका संज्ञान कब लेगा?
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपनी जगह है, लेकिन सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाली या जातिगत वैमनस्य को बढ़ावा देने वाली भाषा पर जिम्मेदार संस्थाओं को गंभीरता से संज्ञान लेना चाहिए।
अब देखना होगा कि दतिया पुलिस, साइबर सेल और प्रशासन इस मामले में क्या कार्रवाई करता है।


