
एमआईटी डब्ल्यूपीयू में संस्कृत दिवस उत्साह के साथ मनाया गया
रिपोर्ट विशाल समाचार
स्थान पुणे महाराष्ट्र
पुणे, : संस्कृत केवल देवभाषा ही नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा का संवहन करने वाली एक समृद्ध ज्ञान-भाषा है। संस्कृत भाषा के संरक्षण और व्यापक प्रसार के लिए समाज में अधिक प्रभावी जनजागरूकता की आवश्यकता है, यह विचार सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के संस्कृत व प्राकृत भाषा विभाग के प्रो. डॉ. दिनेश रसाल ने व्यक्त किए।
एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर संस्कृत एंड इंडियन नॉलेज सिस्टम्स की ओर से संत ज्ञानेश्वर भवन स्थित वर्ल्ड पीस लाइब्रेरी में संस्कृत दिवस उत्साहपूर्ण वातावरण में मनाया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में वे बोल रहे थे।
इस अवसर पर एमआईटी डब्ल्यूपीयू के कुलपति प्रो. डॉ. दत्ता दांडगे, प्रसिद्ध गप्पाष्टककार व वरिष्ठ सलाहकार डॉ. संजय उपाध्ये, डॉ. विष्णु भिसे, संस्कृत भारती पुणे प्रांत के प्रो. पै, पीस स्टडीज विभाग के डॉ. भागवत, सेंटर के समन्वयक डॉ. संदीप ढिकले उपस्थित थे।
यह कार्यक्रम एमआईटी के संस्थापक विश्वधर्मी प्रो. डॉ. विश्वनाथ कराड के आशीर्वाद और एमआईटी डब्ल्यूपीयू के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. राहुल कराड के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ।
डॉ. रसाल ने कहा, “संस्कृत का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया (इंडोनेशिया, कंबोडिया) और मध्य एशिया तक फैला है। संक्षेप में, संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत के ज्ञान, संस्कृति और दर्शन की जीवंत विरासत है।”
डॉ. संजय उपाध्ये ने कहा, “भाषा का सदुपयोग केवल संवाद तक सीमित न रहे, बल्कि छात्रों के साथ जुड़ने और उनमें मूल्य-संवर्धन के प्रभावी माध्यम के रूप में हो।”

कुलपति प्रो. डॉ. दत्ता दांडगे ने कहा, “विश्वविद्यालय ने स्थापना से ही मूल्य-आधारित शिक्षा और भारतीय ज्ञान-परंपरा के संरक्षण, संवर्धन व प्रसार को विशेष प्राथमिकता दी है। आधुनिक शिक्षा को भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और प्राचीन ज्ञान-परंपरा से जोड़ना एमआईटी डब्ल्यूपीयू की विशिष्ट शैक्षणिक परंपरा है। संस्कृत का केवल प्रचार नहीं, बल्कि उसके अध्ययन, उपयोग और साधना का लोकतंत्रीकरण होना चाहिए। एमआईटी का संस्कृत और IKS सेंटर इसमें महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।”


