
कलाकार को उपेक्षितों की आवाज बनना चाहिए
उर्गेन आर्ट फेस्टिवल के कलाकार परिसंवाद में वरिष्ठ कलाकारों ने रखे विचार
रिपोर्ट विशाल समाचार
स्थान पुणे महाराष्ट्र
पुणे। कलाकार के रूप में काम करते समय अपने भीतर की संवेदनशीलता को हमेशा जागरूक रखना चाहिए। यदि हम समाज को संवेदनशील दृष्टि से देखते हैं, तो हमारी कला और अधिक निखरती है। कलाकार का काम केवल समाज का मनोरंजन करना नहीं, बल्कि समाज को जागरूक रखना और उपेक्षित वर्ग के सवालों को अपनी कला के माध्यम से उठाकर उनकी आवाज बनना भी है। यह विचार चित्रकला, रंगमंच और अन्य कला क्षेत्रों से जुड़े वरिष्ठ कलाकारों ने व्यक्त किए।
करुणादीप फाउंडेशन और त्रिरत्न वैरोचना सेंटर की ओर से बालगंधर्व रंगमंदिर में आयोजित उर्गेन आर्ट फेस्टिवल के तहत कलाकार परिसंवाद का आयोजन किया गया। इस दौरान वरिष्ठ कलाकारों ने कला, कलाकार और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों पर विचार साझा किए। परिसंवाद में वरिष्ठ छायाचित्रकार पद्मश्री सुधाकर ओलवे, वरिष्ठ चित्रकार मोगलान श्रावस्ती, वरिष्ठ चित्रकार सविंद्र सावरकर और वरिष्ठ रंगकर्मी संजय जीवने सहित अन्य कलाकार शामिल हुए।
समाज के सवालों को तस्वीरों में उतारा : सुधाकर ओलवे
पद्मश्री सुधाकर ओलवे ने कहा कि पत्रकार के रूप में काम करते समय उनकी आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी। अमीर लोगों के घर जाकर उनके फोटो खींचना उनका काम था। यह परिस्थिति उनके मन को पीड़ा देती थी। इसी कारण उन्होंने समाज के वास्तविक सवालों को छायाचित्रों के माध्यम से सामने लाने का काम शुरू किया।
उन्होंने कहा कि देवदासी प्रथा, जाति व्यवस्था और ‘बेटी नहीं चाहिए’ जैसी सामाजिक मानसिकताओं को उन्होंने अपनी तस्वीरों के माध्यम से सामने रखा है। समाज की वास्तविकता उनके छायाचित्रों में दिखाई देती है, यही उनके लिए संतोष की बात है।
विपरीत परिस्थितियां भी कलाकार को रोक नहीं सकतीं : सविंद्र सावरकर
सविंद्र सावरकर ने कहा कि कलाकार के रूप में वे अपनी कला के माध्यम से जो कहना चाहते हैं, उसे स्पष्ट रूप से सामने रखते हैं। इसके लिए वे किसी भी प्रकार का दबाव स्वीकार नहीं करते। विपरीत परिस्थितियां आने के बावजूद वे अपने भीतर के कलाकार को शांत नहीं बैठने देते। यही कारण है कि उनकी कला समाज और विशेष रूप से युवाओं को आकर्षित कर रही है।
कला में आंबेडकर और बुद्ध के विचार आने चाहिए : संजय जीवने
संजय जीवने ने कहा कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों को सामने नहीं रखने वाले अनेक नाटक तैयार होते हैं, लेकिन यह समाज की अधोगति का संकेत है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और गौतम बुद्ध के समानता के विचारों को कला के माध्यम से समाज तक पहुंचाया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने वर्ष 1936 में प्रबोधनकार ठाकरे के नाटक ‘खरा ब्राह्मण’ की समीक्षा भी की थी। इसलिए बाबासाहेब को केवल समाज सुधारक के रूप में नहीं, बल्कि कला और साहित्य सहित विभिन्न क्षेत्रों में उनकी दृष्टि रखने वाले व्यक्तित्व के रूप में भी समझने की आवश्यकता है।
चित्रकला के माध्यम से हो समाज प्रबोधन : मोगलान श्रावस्ती
मोगलान श्रावस्ती ने कहा कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और गौतम बुद्ध के विचारों को अभिव्यक्त करने वाली अनेक ऐतिहासिक लेणियों (गुफाओं) की आज दयनीय स्थिति है। हमें इन्हें समाज की विरासत के रूप में देखना चाहिए। लेकिन आत्ममग्न समाज इन ऐतिहासिक धरोहरों और उनसे मिलने वाली शिक्षा से दूर होता जा रहा है। यही कारण है कि समाज में अधोगति की स्थिति पैदा हो रही है।
उन्होंने कहा कि कलाकार चित्रकला के माध्यम से समाज का प्रबोधन कर सकता है। चित्रकला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसके जरिए समाज को शिक्षा और जागरूकता भी मिलनी चाहिए। यही उनकी दृढ़ भूमिका है।



