
गणेशोत्सव में ध्वनिप्रदूषण पर तकनीक से समाधान का प्रस्ताव
डीजे बंद किए बिना एफएम ट्रांसमीटर से सीधे कानों तक पहुंचाया जा सकेगा संगीत
रिपोर्ट विशाल समाचार
स्थान नाशिक महाराष्ट्र
नाशिक,। गणेशोत्सव के दौरान डीजे, ध्वनिवर्धक और बढ़ते ध्वनिप्रदूषण को लेकर जारी बहस के बीच नाशिक के नवोन्मेषक, तकनीक विशेषज्ञ और उद्यमी डॉ. सुनील खांडबहाले ने तकनीक आधारित एक वैकल्पिक समाधान सुझाया है। उनका प्रस्ताव है कि डीजे का संगीत बड़े लाउडस्पीकरों से पूरे परिसर में फैलाने के बजाय एफएम ट्रांसमीटर के माध्यम से एक निर्धारित रेडियो फ्रीक्वेंसी पर प्रसारित किया जाए और उत्सव में शामिल लोग उसे एफएम रिसीवर, हेडफोन या उपयुक्त श्रवण उपकरण के जरिए सुनें।
डॉ. खांडबहाले के अनुसार इससे गणेशोत्सव की मस्ती, नृत्य और सामूहिक सहभागिता बरकरार रह सकती है, जबकि आसपास रहने वाले लोगों को तेज आवाज से होने वाली परेशानी से राहत मिल सकती है। उनका कहना है कि सवाल केवल डीजे रखने या बंद करने का नहीं, बल्कि ऐसा तीसरा विकल्प तलाशने का है, जिसमें उत्सव का आनंद और नागरिकों की शांति दोनों सुरक्षित रहें।
प्रस्तावित व्यवस्था में डीजे या म्यूजिक सिस्टम को एफएम ट्रांसमीटर से जोड़ा जाएगा। ट्रांसमीटर संगीत को रेडियो सिग्नल में बदलकर निर्धारित क्षेत्र में प्रसारित करेगा। सहभागी उसी फ्रीक्वेंसी पर अपने एफएम रिसीवर को ट्यून कर हेडफोन या अन्य उपयुक्त उपकरण के माध्यम से संगीत सुन सकेंगे। इस तरह सड़क पर मौजूद लोग एक ही संगीत पर सामूहिक रूप से नृत्य कर सकेंगे, लेकिन आसपास के घरों और इमारतों तक तेज ध्वनि नहीं पहुंचेगी।
खांडबहाले ने स्पष्ट किया कि यह ‘साइलेंट डांस’ की तरह व्यक्तिगत गतिविधि नहीं, बल्कि सामूहिक उत्सव का ही एक अलग तकनीकी माध्यम होगा। अंतर केवल इतना होगा कि संगीत को बड़े स्पीकर से पूरे क्षेत्र में फैलाने के बजाय व्यक्तिगत श्रवण उपकरणों तक पहुंचाया जाएगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हेडफोन पर अत्यधिक तेज आवाज से बचना जरूरी होगा।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सार्वजनिक उपयोग से पहले रेडियो फ्रीक्वेंसी, वायरलेस संचार, उपकरणों की स्वीकृति, लाइसेंस अथवा लाइसेंस-मुक्त उपयोग से जुड़े सभी नियमों का पालन आवश्यक होगा। किसी भी ट्रांसमीटर या फ्रीक्वेंसी का मनमाना इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। प्रशासन और संबंधित तकनीकी संस्थाओं के मार्गदर्शन में नियंत्रित तरीके से इसकी प्रयोगात्मक जांच की जा सकती है।
डॉ. खांडबहाले के मुताबिक तेज आवाज का असर केवल असुविधा तक सीमित नहीं है। इससे नींद में खलल, तनाव, एकाग्रता में कमी और श्रवण क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव जैसी समस्याएं हो सकती हैं। बच्चों, बुजुर्गों, मरीजों और पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के लिए लगातार तेज आवाज अधिक परेशानी का कारण बन सकती है। ऐसे में धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों की परंपरा को बनाए रखते हुए ध्वनि प्रदूषण को कम करने के लिए तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है।
उनका कहना है कि यह प्रयोग गणेशोत्सव के अलावा नवरात्रि, गरबा, दहीहंडी, धार्मिक एवं सांस्कृतिक जुलूस, सामाजिक जागरूकता कार्यक्रम और अन्य बड़े सार्वजनिक आयोजनों में भी स्थानीय परिस्थितियों तथा कानूनी नियमों के अनुसार आजमाया जा सकता है।
डॉ. खांडबहाले इससे पहले 2015 के नाशिक सिंहस्थ कुंभ मेले के दौरान ‘कुंभथॉन’ के माध्यम से बड़े सार्वजनिक आयोजनों की समस्याओं के लिए तकनीक और नवाचार आधारित समाधान तलाशने की पहल से जुड़े रहे हैं। भारतीय भाषाओं के लिए डिजिटल तकनीक विकसित करने वाली ‘खंडबहाले डॉट कॉम’ के वे संस्थापक हैं।
उन्होंने कहा कि इस प्रस्ताव का उद्देश्य किसी विशेष उपकरण की बिक्री या व्यावसायिक लाभ नहीं है। प्रशासन, गणेश मंडलों या सामाजिक संस्थाओं की रुचि होने पर सार्वजनिक हित में इस अवधारणा के प्रायोगिक परीक्षण के लिए नि:शुल्क मार्गदर्शन देने की उनकी तैयारी है।
अब सवाल यह है कि ‘डीजे चाहिए या नहीं’ की बहस से आगे बढ़कर क्या तकनीक के जरिए ऐसा रास्ता निकाला जा सकता है, जिसमें उत्सव का उत्साह भी बना रहे और आसपास के नागरिकों की शांति भी प्रभावित न हो। डॉ. खांडबहाले की यह अवधारणा इसी दिशा में एक प्रयोगात्मक विकल्प प्रस्तुत करती है।



