
‘हिन्दुओं की कथित बदनामी’ पर भाजपा और शिंदे सेना का शोर सत्ता की विफलता से ध्यान भटकाने की साजिश: कांग्रेस की कड़ी प्रतिक्रिया ,गोपाल दादा तिवारी
क्या 2014 से 2019 तक की अपनी सत्ता में ‘कथित हिन्दू विरोधी साजिश’ को उजागर क्यों नहीं कर पाई भाजपा? क्या सरकारी वकील बदलकर सबूत मिटाने का प्रयास था?
नैतिक व संवैधानिक मूल्यों से शून्य शासन में अपराधियों और भ्रष्टाचारियों को खुली छूट मिली हुई है: महाराष्ट्र कांग्रेस का आरोप
पुणे: मालेगांव बम विस्फोट मामले में हिन्दुत्ववादी संगठनों से जुड़े आरोपियों को ‘सम्मानपूर्वक नहीं, बल्कि साक्ष्य के अभाव में’ NIA की विशेष अदालत द्वारा आरोपमुक्त किए जाने के बाद, भाजपा और शिंदे सेना द्वारा कांग्रेस पर लगाए जा रहे आरोप सत्ता में अपनी असफलता को छिपाने की कोशिश है — ऐसा तीखा आरोप महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता गोपालदादा तिवारी ने किया है।
उन्होंने कहा कि मालेगांव बम विस्फोट की जांच तत्कालीन ATS प्रमुख हेमंत करकरे जैसे कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार अधिकारी ने की थी। उस समय जांच एजेंसियों द्वारा प्रस्तुत ऑडियो क्लिप्स, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और आरोपियों के बयानों सहित पर्याप्त सबूत सामने आए थे।
2014 में सत्ता परिवर्तन के बाद, NIA की ओर से सरकारी वकील रहीं रोहिणी सालियन ने यह सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि उन पर मुकदमे में नरमी बरतने का दबाव डाला जा रहा है। इसके बाद सरकार ने उन्हें हटाकर नए वकीलों की नियुक्ति किस मंशा से की — यह गंभीर सवाल कांग्रेस ने उठाया है।
सितंबर 2011 में, देश के विभिन्न राज्यों के पुलिस प्रमुखों और इंटेलिजेंस ब्यूरो निदेशकों की बैठक में इस विषय पर गंभीर तथ्य सामने आए थे, जिसके आधार पर तत्कालीन गृहमंत्री सुशीलकुमार शिंदे ने संसद में कहा था कि कुछ तत्व ‘भगवा आतंकवाद’ को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। असीमानंद जैसे आरोपियों के कबूलनामे भी उस समय सार्वजनिक हुए थे।
गोपालदादा तिवारी ने कहा कि गृह मंत्री का वक्तव्य किसी पार्टी विशेष का राजनीतिक मत नहीं, बल्कि तत्कालीन परिस्थितियों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन होता है। यदि आज अदालत ने आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में निर्दोष घोषित किया है, तो अब जाकर भाजपा द्वारा “भगवा आतंकवाद” पर बवाल खड़ा करना जनता का ध्यान भटकाने और अपनी विफलताओं से ध्यान हटाने का प्रयास है।
उन्होंने पूछा कि जब 2014 से 2019 तक देश और राज्य में भाजपा की पूर्ण सत्ता थी, तब उन्होंने इस तथाकथित षडयंत्र पर एक भी एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की? क्या उस दौरान सरकारी वकील बदलकर और सबूत नष्ट कर, पूरे मामले को ही कमजोर करने की कोशिश की गई?
गोपालदादा ने भाजपा के “हिन्दू विरोधी कांग्रेस” के आरोप को तथ्यहीन और बचकाना बताते हुए कहा कि जिन लोगों को भारतीय संस्कृति की इतनी चिंता है, वे यह भूल जाते हैं कि रामायण और महाभारत जैसी ऐतिहासिक सीरियलें देश में इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नेतृत्व में दूरदर्शन पर लाई गई थीं — जिसे हर रविवार घर-घर में देखा गया। क्या यह conveniently भुला दिया गया है?
कांग्रेस प्रवक्ता ने यह भी सवाल किया कि यदि महायुति सरकार मुंबई बम विस्फोट के फैसले के खिलाफ अपील करेगी, तो फिर मालेगांव मामले में अपील क्यों नहीं? क्या धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करने वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस को यह दोहरा मापदंड स्वीकार है? उन्होंने यह सवाल उपमुख्यमंत्री अजीतदादा पवार से सीधे तौर पर पूछा।
उन्होंने कहा कि जब एनआईए ने खुद इन मामलों में मृत्युदंड की मांग की थी, तब उनकी विश्वसनीयता दांव पर थी। ऐसे में वरिष्ठ न्यायालय में अपील करना स्वाभाविक न्याय और जनहित की दृष्टि से आवश्यक था।
अंत में कांग्रेस ने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार जाति और धर्म देखकर अपील करने या न करने का निर्णय ले रही है, जो मंत्री पद की शपथ और संविधान के विरुद्ध है। साथ ही उन्होंने पूछा कि क्या निष्पाप नागरिकों की हत्याओं को न्याय मिलेगा, या यह भी वोटबैंक की राजनीति की भेंट चढ़ जाएगा? देश की जनता अब इस पर नजर बनाए हुए है।



