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दलितों को मिले स्वतंत्र मतदाता-संघ

दलितों को मिले स्वतंत्र मतदाता-संघ!

पूना पैक्ट धिक्कार सम्मेलन’ से बसपा का ऐलान

 

पुणे,:दलित समाज पर 9 दशक पहले लादे गए अन्यायपूर्ण इतिहास को मिटाने का समय आ गया है। ‘पूना पैक्ट’ के जरिए बहुजन समाज का राजनीतिक प्रतिनिधित्व केवल आरक्षित मतदाता-संघ तक सीमित कर दिया गया। लेकिन अब दलितों को स्वतंत्र मतदाता-संघ देकर मोहनदास करमचंद गांधी और कांग्रेस द्वारा की गई भूल को सुधारा जाए—यह मांग बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की ओर से आयोजित “पूना पैक्ट धिक्कार सम्मेलन” में एक सुर में की गई।

 

बुधवार (24 सितम्बर) को येरवडा के लोकशाहीर अण्णाभाऊ साठे सभागृह में सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इस अवसर पर पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं महाराष्ट्र के केंद्रीय समन्वयक, पूर्व सांसद राजाराम साहेब, प्रदेशाध्यक्ष एडवोकेट सुनील डोंगरे, प्रदेश प्रभारी रामचंद्र जाधव, प्रदेश महासचिव डॉ. हुलगेश चलवादी विशेष रूप से उपस्थित थे। पुणे जिलाध्यक्ष अशोक गायकवाड़ ने सम्मेलन का संचालन किया।

 

दलित, शोषित और वंचितों को उनका हक दिलाने के लिए विश्वरत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर का संघर्ष सर्वविदित है। गोलमेज परिषद में डॉ. आंबेडकर ने अंग्रेजों से संघर्ष और तार्किक युक्तिवाद करके अस्पृश्यों के लिए स्वतंत्र मतदाता-संघ का अधिकार मंजूर कराया और ‘द्वि-मतदान’ का हक दिलाया था। इससे विधायिका और विधानमंडल में दलित समाज के हितैषी सच्चे प्रतिनिधि ही चुने जाते थे। लेकिन कांग्रेस और गांधी को अस्पृश्यों को मिला स्वतंत्र मतदाता-संघ का अधिकार स्वीकार्य नहीं था। दलित-विरोधी मानसिकता से प्रेरित होकर गांधी ने येरवडा जेल में उपवास शुरू किया। इसके बाद देशहित को देखते हुए डॉ. आंबेडकर को ‘पूना पैक्ट’ पर हस्ताक्षर करने पड़े। यही पूना पैक्ट दलित अधिकारों पर कुठाराघात साबित हुआ, ऐसा प्रतिपादन राजाराम साहेब ने किया।

 

महामानव डॉ. आंबेडकर को जिस ‘शासनकर्ता समाज’ की कल्पना थी, उसे साकार करने के लिए बहुजन समाज को एक ही नीले झंडे के नीचे आना होगा। ‘हाथी’ चुनाव-चिह्न वाले बसपा के नीले झंडे तले ही बहुजन आंदोलन को सफलता और सत्ता मिल सकती है। यही प्रतिपादन प्रदेशाध्यक्ष एडवोकेट सुनील डोंगरे ने किया।

 

गांधी ने दलितों को न्यायसंगत अधिकारों से वंचित किया!

 

पूना पैक्ट के जरिए गांधी ने दलितों की प्रगति के मार्ग में बाधा खड़ी की थी, यह डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का स्पष्ट मत था। उनका कहना था कि गांधी का आमरण उपवास दलितों को उनके न्यायसंगत हक से वंचित करने का एक नाटक था। इसकी झलक आज भी समय-समय पर देखने को मिलती है। गांधी की दलित-विरोधी मानसिकता के चलते कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों ने दलितों का शोषण किया। अब समय आ गया है कि बहुजन समाज बसपा को राजनीतिक शक्ति देकर इस मानसिकता को सबक सिखाए—ऐसा आह्वान प्रदेश महासचिव डॉ. हुलगेश चलवादी ने किया।

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