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बहुजन आंदोलन के राजनीतिक दल ‘बसपा’ के नीले झंडे तले एक हों!

बहुजन आंदोलन के राजनीतिक दल ‘बसपा’ के नीले झंडे तले एक हों!

 

संयुक्त चुनाव लड़ें डॉ. हुलगेश चलवादी का आह्वान

 

विशाल समाचार  पुणे:छत्रपति शिवाजी महाराज, छत्रपति शाहू महाराज, महात्मा ज्योतिराव फुले और भारतरत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर की वैचारिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए, बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम साहब द्वारा दिखाए गए मार्ग पर प्रगतिशील महाराष्ट्र में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ‘हाथी’ चुनाव चिन्ह वाले झंडे के तले कार्यरत है। इस झंडे के नीचे बहुजन आंदोलन से जुड़े सभी राजनीतिक दलों को एकजुट होने का आह्वान पार्टी के प्रदेश महासचिव और पश्चिम महाराष्ट्र ज़ोन के मुख्य प्रभारी डॉ. हुलगेश चलवादी ने गुरुवार (दिनांक 16 अक्टूबर) को किया।

 

डॉ. चलवादी ने कहा कि बहुजन समाज को एकजुट होकर आगामी चुनावों में हिस्सा लेना चाहिए। नए वर्ष में प्रस्तावित स्थानीय स्वराज संस्थाओं के चुनाव बसपा अपने दम पर लड़ेगी। परंतु यदि बहुजन आंदोलन में कार्यरत तथा आंबेडकरवादी विचारधारा के अन्य राजनीतिक दल बसपा के साथ एकजुट होते हैं, तो सत्ता तक पहुंचने का मार्ग और अधिक सुलभ होगा।

 

उन्होंने कहा कि महापुरुषों के विचारों को सामने रखकर सत्ता प्राप्ति का सपना बसपा ने साकार किया है। मान्यवर कांशीराम जी द्वारा शुरू की गई यह वैचारिक आंदोलन बहुजनों को “शासनकर्ता जाति” बनाने में सक्षम है। इसी आंदोलन के माध्यम से उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े राज्य में “आयरन लेडी” माननीया सुश्री मायावती जी ने चार बार मुख्यमंत्री पद संभालकर बहुजन समाज को मुख्यधारा में लाने का कार्य किया।

 

प्रगतिशील महाराष्ट्र, जो बहुजन आंदोलन का गढ़ माना जाता है, वहां भी यह संभव है। परंतु यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मत विभाजन के लिए प्रस्थापित (स्थापित) राजनीतिक दल बहुजनों को अलग-अलग गुटों में बांटने में सफल हो गए हैं। इस पर डॉ. चलवादी ने खेद व्यक्त किया।

 

उन्होंने कहा कि यदि आगामी स्थानीय स्वराज संस्थाओं के चुनाव बहुजन एकजुट होकर लड़ें, तो राज्य की अधिकांश नगरपालिकाओं, जिला परिषदों और नगर पंचायतों में शोषित–वंचित–पीड़ित–उपेक्षित समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले दलों की सत्ता स्थापित हो सकती है।

 

डॉ. चलवादी ने यह भी कहा कि बहुजन समाज के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और राजनीतिक प्रश्नों को लेकर संघर्ष करने वाले सभी दलों ने यदि एकजुट होकर बहुजन आघाड़ी का गठन कर चुनाव लड़ा, तो बहुजन मतों का विभाजन नहीं होगा और किसी भी स्थापित राजनीतिक दल के लिए बहुजन समाज को “शासनकर्ता जाति” बनने से रोकना संभव नहीं होगा।

 

उन्होंने स्पष्ट कहा कि “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी” के सूत्र के आधार पर एकजुट होकर चुनावी संदर्भ में राजनीतिक प्रतिनिधित्व तय करने पर भी विचार किया जा सकता है।

 

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