
प्रयागराज मेले में साधुओं को गनर क्यों? जनता के टैक्स पर सवाल
📰 रिपोर्ट विशाल समाचार प्रयागराज
प्रयागराज में चल रहे मेले के दौरान एक बड़ा और सीधा सवाल खड़ा हो गया है—
आख़िर साधू-संतों को गनर की ज़रूरत क्यों?
सरकार और प्रशासन जिस सुरक्षा व्यवस्था का दावा कर रहे हैं, वह आम जनता के टैक्स से खड़ी की गई है। पुलिस बल, पीएसी, विशेष फोर्स, कंट्रोल रूम और निगरानी—सब कुछ जनता के पैसों से। ऐसे में जब वही टैक्स से बनी सुरक्षा पहले से तैनात है, तो फिर कुछ साधुओं के साथ निजी गनर किस आधार पर?
साधु-संत परंपरागत रूप से त्याग, निर्भयता और वैराग्य के प्रतीक माने जाते हैं। न धन का मोह, न सत्ता का भय—यही उनकी पहचान रही है। फिर सवाल उठता है कि क्या आज के साधु डर में जी रहे हैं? या फिर गनर रखना अब प्रतिष्ठा और प्रभाव दिखाने का साधन बनता जा रहा है?
अगर वास्तव में किसी साधु को जान का खतरा है, तो प्रशासन को इसकी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।
और अगर खतरा नहीं है, तो जनता यह जानना चाहती है कि उसके टैक्स के पैसे से बनी सुरक्षा के बावजूद अलग गनर क्यों?
यह सवाल किसी आस्था पर नहीं, व्यवस्था पर है।
यह सवाल साधु-संत पर नहीं, सिस्टम पर है।
प्रयागराज मेला श्रद्धा और विश्वास का आयोजन है, न कि फिल्मी भौकाल का मंच।
जनता अब जवाब चाहती है—गनर ज़रूरत है या दिखावा?
स्पष्टीकरण:यह रिपोर्ट किसी भी साधु-संत, संप्रदाय या सनातन परंपरा के विरोध में नहीं है।
यह सवाल केवल प्रशासनिक व्यवस्था और जनता के टैक्स से जुड़ी सुरक्षा नीति को लेकर है।
विशाल समाचार सभी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करता है।
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