कंस्ट्रक्शन कार्य के दौरान आंखों में चोट लगे तीन मजदूरों पर पीबीएमए के एच.व्ही.देसाई आय हॉस्पिटल में सफल कॉर्निओ-स्क्लेरल टेअर सुचरिंग प्रक्रिया
पुणे, विशाल समाचार
कंस्ट्रक्शन स्थल पर आंखों में चोट लगने से तीन मजदूरों पर पीबीएमए के एच.व्ही.देसाई आय हॉस्पिटल में सफलतापूर्वक कॉर्निओ-स्क्लेरल टेअर सुचरिंग प्रक्रिया की गई. इनमें से दो मजदूरों की आंखों में लोहे की कीलों के कारण चोट लगी थी, जबकि तीसरे मजदूर की आंख में ग्राइंडिंग के काम के दौरान तेज़ी से उड़ते कणों के कारण चोट आई थी. यह प्रक्रिया पीबीएमए के एच.व्ही.देसाई आय हॉस्पिटल के कॉर्निया विभाग की प्रमुख एवं नेत्रपेढी की संचालिका डॉ. शिल्पा जोशी के नेतृत्व में कॉर्निया विशेषज्ञ डॉ. स्नेहल घाडगे और डॉ. पूजा अंधारे सहित डॉक्टरों की टीम द्वारा की गई. तीनों मजदूर उत्तर भारत से आए युवा हैं.
इस संबंध में अधिक जानकारी देते हुए डॉ. शिल्पा जोशी ने बताया कि कंस्ट्रक्शन कार्य के दौरान इन मजदूरों की आंखों में चोट लगी थी. इस प्रकार की चोट अत्यंत पीड़ादायक होती है, क्योंकि धातु के छोटे-छोटे कण तेज़ गति से आंख को नुकसान पहुंचाते हैं. तीनों को दाईं आंख में चोट आई थी. चोट की गंभीरता और छिद्र की व्याप्ती मापने के लिए स्लिट लैम्प जांच की गईं.
डॉ. जोशी ने बताया कि इसका निदान दो चरणों में किया जाता है. उसमें से एक चरण यह है – जांचना होता है कि आंख के अंदर कोई कण तो नहीं गया है, जिसके लिए एक्स-रे या सीटी स्कैन किया जाता है; यह जांच बाद में भी की जा सकती है. लेकिन सबसे ज़रूरी कदम घाव को ठीक करना था. निदान के तुरंत बाद, मरीज़ों को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया और कार्निया-स्क्लेरल टिअर सुचरिंग प्रोसीजर की गई.
कार्निया-स्क्लेरल टिअर सुचरिंग एक अत्यंत नाजुक शल्यक्रिया होती है. इस प्रक्रिया के माध्यम से आंख के सफेद हिस्से (स्क्लेरा) और आंख के सामने स्थित कॉर्निया को हुई चोट को ठीक किया जा सकता है. इसमें आंख की अखंडता को पुनः स्थापित करने, जलरोधक सील सुनिश्चित करने और संक्रमण के खतरे को कम करने के लिए कॉर्निया की स्तर का सावधानीपूर्वक पुनर्निर्माण करते हुए बारीक टांकों का उपयोग किया जाता है, जिसके लिए अचूक तकनीकी कौशल की आवश्यकता होती है.
इन तीनों में से दो मरीजों की आंखों की स्थिति अच्छी है, क्योंकि उनकी चोटें दृश्य अक्ष (व्हिजुल एक्सेस ) के बाहर थीं. संक्रमण न हो, इसके लिए नियमित जांच आवश्यक है और मरीजों को समय-समय पर अस्पताल आना होगा. 6 से 8 सप्ताह के बाद टांके निकाले जाएंगे. इसके बाद दृष्टि सुधार के लिए चश्मे या कॉन्टैक्ट लेंस की आवश्यकता पड़ सकती है. तीसरे मरीज की कॉर्निया के मध्य भाग में चोट लगी है, जिसके कारण भविष्य में केराटोप्लास्टी (कॉर्निया प्रत्यारोपण) शल्यक्रिया की आवश्यकता हो सकती है.
डॉ. जोशी ने कहा कि आंखों की चोट एक आपातकालीन स्थिति होती है और ऐसे समय में सही उपचार के लिए बहुशाखीय दृष्टिकोण और योग्य व्यवस्थापन की आवश्यकता होती है. इसलिए ऐसी आपात स्थिति में मरीजों को तुरंत नजदीकी टर्शरी आय केअर हॉस्पिटल ले जाना आवश्यक है. अस्पताल पहुंचने में देरी होने पर संक्रमण और आगे की जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है.
पुणे जैसे तेज़ी से बढ़ते शहरों में कंस्ट्रक्शन का कार्य लगातार चलते रहते हैं. इसलिए कार्यस्थल पर आँखों की सुरक्षा के बारे में जागरूकता अत्यंत आवश्यक है. ऐसे स्थानों पर काम करने वाले लोग अक्सर दूसरे राज्यों से आते हैं. सामान्यतः ये लोग आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं, इनके पास बीमा नहीं होता और किसी भी सरकारी स्वास्थ्य योजना का लाभ लेने के लिए आवश्यक डॉक्यूमेंट भी नहीं होते.
पीबीएमए के एच.व्ही.देसाई आय हॉस्पिटल के मुख्य वैद्यकीय संचालक डॉ. राहुल देशपांडे ने कहा कि बीस वर्ष की आयु के युवाओं की दृष्टि वापस लाने में मदद करने वाली हमारी बहुविषयक टीम के प्रयास सराहनीय हैं. चिकित्सा विशेषज्ञों के साथ-साथ सहायक कर्मचारियों ने एमपीजेएवाई योजना के अंतर्गत आवश्यक दस्तावेजों की प्रक्रिया तुरंत पूरी की और जिनके पास दस्तावेज नहीं थे, ऐसे तीसरे युवक के लिए वित्तीय सहायता जुटाने हेतु समन्वय किया. अत्याधुनिक सुविधाएं और उपकरण, जटिल स्थितियों का दैनंदिन व्यवस्थापन करने वाले कुशल डॉक्टर तथा सहायक कर्मचारियों के त्वरित प्रयासों के कारण हम मरीजों को समय पर और सर्वोत्तम उपचार प्रदान करने में सक्षम हैं.


