
निर्माण उद्योग के सुरक्षित भविष्य के लिए नवाचार जरूरी
‘कंस्ट्रो 2026’ में ‘भारतीय निर्माण उद्योग का भविष्य’ विषय पर विशेषज्ञों की राय
पुणे विशाल समाचार: यदि निर्माण व्यवसाय के भविष्य को सुरक्षित बनाना है, तो मौजूदा चुनौतियों का समाधान नवाचार के माध्यम से करना अनिवार्य है। निर्माण उद्योग में सीमेंट का अत्यधिक उपयोग पर्यावरण पर भारी दबाव डालता है। इस दबाव को कम करने के लिए सीमेंट के विकल्प के रूप में फ्लाई ऐश जैसे पदार्थों का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए, ऐसा प्रतिपादन जे. कुमार डिफेंस एंड एयरोस्पेस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी यूसुफ इनामदार ने किया।
पुणे कंस्ट्रक्शन इंजीनियरिंग रिसर्च फाउंडेशन (पीसीईआरएफ), पुणे महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण (पीएमआरडीए) और पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित चार दिवसीय 20वें अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी ‘कंस्ट्रो 2026’ में ‘भारतीय निर्माण उद्योग का भविष्य’ विषय पर आयोजित पैनल चर्चा में वे बोल रहे थे। यह कार्यक्रम मोशी स्थित अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी केंद्र में आयोजित किया गया था।
इस अवसर पर ‘कंस्ट्रो 2026’ के चेयरमैन जयदीप राजे, शुभम ईपीसी की निदेशक अर्चना बडेर, इंडिया प्लंबिंग एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष सुभाष देशपांडे, प्रीकास्ट इंडिया इंटरनेशनल के प्रबंध निदेशक अजित भाटे, पीसीईआरएफ के उपाध्यक्ष जयंत इनामदार सहित अन्य मान्यवर उपस्थित थे।
इनामदार ने बताया कि पुणे शहर में हर वर्ष लगभग 80 लाख टन सीमेंट का उपयोग होता है। सीमेंट के साथ-साथ बड़ी मात्रा में पीने के पानी की भी खपत होती है। इसलिए सीमेंट के स्थान पर फ्लाई ऐश और पीने के पानी के स्थान पर शोधन किए गए अपशिष्ट जल (ट्रीटेड वॉटर) का उपयोग किया जाना चाहिए। नवाचार और उन्नत तकनीक के माध्यम से निर्माण परियोजनाएं कम समय में पूरी की जा सकती हैं, ऐसा भी उन्होंने कहा।
सुभाष देशपांडे ने कहा कि सरकार की नीतियां अधिक कठोर होती जा रही हैं, जिससे निर्माण उद्योग को शोधन किए गए अपशिष्ट जल का उपयोग करना ही होगा। नई नीति के अनुसार डेवलपर्स के लिए जल संतुलन पत्रक (वॉटर बैलेंस शीट) प्रस्तुत करना अनिवार्य है। अधिक से अधिक वर्षा जल संचयन के लिए सायफॉनिक पाइप सिस्टम को बढ़ावा देना चाहिए। साथ ही, नलों में जल प्रवाह को नियंत्रित करने वाली नई तकनीकों के उपयोग से पानी की खपत आधे से भी अधिक कम की जा सकती है।
अर्चना बडेर ने कहा कि भारतीय निर्माण उद्योग की शुरुआत श्रम आधारित प्रणाली से हुई थी। इसके बाद स्वचालन का दौर आया और अब हम ‘रियल-टाइम’ युग में प्रवेश कर चुके हैं। गति, गुणवत्ता और मजबूती सुनिश्चित करने के लिए समय के अनुसार बदलाव अपनाना जरूरी है।
जयंत इनामदार ने संरचनात्मक स्टील (स्ट्रक्चरल स्टील) के उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि इससे कार्पेट एरिया में लगभग 40 प्रतिशत तक वृद्धि होती है, समय की बचत होती है और इसमें प्रयुक्त 80 से 90 प्रतिशत सामग्री को पुनः उपयोग में लाया जा सकता है।
अजित भाटे ने बताया कि प्रीकास्ट कॉलम और दीवारों के उपयोग से निर्माण का समय कम होता है और गुणवत्ता में निरंतरता बनी रहती है। जयदीप राजे ने भी निर्माण उद्योग के भविष्य को लेकर अपने विचार साझा किए।
इस सत्र में बड़ी संख्या में युवा इंजीनियर, इंजीनियरिंग के विद्यार्थी और उद्योग जगत के पेशेवर उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन मनोज देशमुख ने किया।

