इटावाउत्तर प्रदेश

आठ महीने तक दबाई गई शिकायतें, अब सवालों के घेरे में पूरा सिस्टम

भ्रष्टाचार के आरोप, डीपीआरओ–लखनऊ कनेक्शन और राजनीतिक दखल

आठ महीने तक दबाई गई शिकायतें, अब सवालों के घेरे में पूरा सिस्टम

भ्रष्टाचार के आरोप, डीपीआरओ–लखनऊ कनेक्शन और राजनीतिक दखल

सांसद के पत्र से बढ़ा प्रशासनिक दबाव, लेकिन संघर्ष पहले से जारी था

रिपोर्ट: देवेन्द्र तोमर 

स्थान: इटावा, उत्तर प्रदेश

इटावा में सामने आया यह मामला अब केवल एक प्रशासनिक शिकायत नहीं रह गया है, बल्कि यह सिस्टम, जवाबदेही और कथित भ्रष्टाचार पर बड़ा सवाल बन चुका है। पिछले आठ महीनों से लगातार की गई शिकायतें, लखनऊ तक भेजे गए प्रमाण, आयकर रिटर्न (ITR) और मीडिया में प्रकाशित खबरें—इन सबके बावजूद यदि किसी प्रकार की ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह स्थिति गंभीर सवाल खड़े करती है।

देवेन्द्र सिंह तोमर द्वारा यह प्रकरण लगातार संबंधित विभागों और उच्च स्तर तक उठाया जाता रहा। हर बार आश्वासन मिले, हर बार फाइलें आगे बढ़ने की बात कही गई, लेकिन जमीनी हकीकत यह रही कि जांच शुरू ही नहीं की गई। समय के साथ यह स्पष्ट होता गया कि मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं, बल्कि जानबूझकर टालने का है

अब जब पूरे प्रकरण की परतें खुलने लगी हैं, तो यह बात सामने आ रही है कि भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते ही बीच में “गंगा-शाह” ली गई। सूत्रों के अनुसार, जैसे ही मामला गंभीर मोड़ पर पहुंचा, दिशा बदलने और दबाव कम करने के प्रयास किए गए। इसी क्रम में पूर्व सांसद को बीच में सक्रिय किया गया, जिससे असली मुद्दा पीछे चला जाए और पूरा मामला राजनीतिक दायरे में सिमट जाए।

प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि पूर्व सांसद कठेरिया चुनावी माहौल को देखते हुए इस पूरे संघर्ष को अपने नाम से जोड़ना चाहते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि आठ महीने की लड़ाई पीछे रहकर, दस्तावेज़ों और तथ्यों के आधार पर लड़ी जाती रही। शिकायतें, सबूत और खबरें पहले से मौजूद थीं—न कि किसी एक दिन में अचानक पैदा हुईं।

इस पूरे मामले के केंद्र में रहे डीपीआरओ वनवारी सिंह को लेकर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं। अब यह बात सूत्रों के हवाले से सामने आ रही है कि उनके कथित संबंध लखनऊ तक फैले हुए हैं। इन्हीं संबंधों के कारण

— शिकायतों पर जांच आगे नहीं बढ़ी,

— जिम्मेदार अधिकारियों ने चुप्पी साधे रखी,

— और मामला महीनों तक फाइलों में दबा रहा।

सबसे अहम सवाल यह है कि जब

▶ शिकायतें समय पर दी गईं,

▶ ITR और अन्य दस्तावेज़ उपलब्ध कराए गए,

▶ और मीडिया में मामला उजागर हो चुका था,

तो कार्रवाई किसके इशारे पर रोकी गई?

 (सांसद  कठेरिया का पत्र )

आठ महीनों से लंबित शिकायतों, उपलब्ध प्रमाणों और मीडिया में प्रकाशन के बाद सांसद प्रो. एस.पी. सिंह कठेरिया द्वारा भेजा गया पत्र इस प्रकरण में प्रशासनिक दबाव का कारण बना। सूत्रों का कहना है कि सांसद के पत्र के बाद ही प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज हुई और मामले को दोबारा देखने की मजबूरी बनी।

हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि मामला पहले से ही तथ्यों और दस्तावेज़ों के साथ मौजूद था, जिसे लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया।

यह सवाल अब और गंभीर हो गया है कि

क्या बिना सांसद के पत्र के इस मामले में कोई सुनवाई संभव थी?

और यदि नहीं, तो फिर आम नागरिक की आठ महीने की मेहनत का क्या मूल्य है?

शिकायतकर्ता का साफ़ कहना है कि यह लड़ाई

किसी सांसद के डर से नहीं,किसी राजनीतिक नाम के सहारे नहीं,

बल्कि सच और दस्तावेज़ों के दम पर लड़ी गई है

हम प्रशासन और राजकारण से डरते नहीं”—यह लड़ाई सिस्टम की जवाबदेही तय करने के लिए है।

आज जब यह मामला चर्चा में है, तो यह याद रखना जरूरी है कि

👉 सच आज पैदा नहीं हुआ,

👉 सबूत आज नहीं आए,

👉 और आवाज आज नहीं उठी।

यह सब आठ महीनों से सिस्टम के सामने रखा गया था।

अब पूरे इटावा और प्रदेश की निगाहें इस पर टिकी हैं कि

क्या डीपीआरओ वनवारी सिंह के खिलाफ निष्पक्ष जांच होगी,

क्या लखनऊ कनेक्शन की सच्चाई सामने आएगी,

या फिर यह मामला भी प्रभाव और राजनीति के बीच दबा दिया जाएगा।

यह अब सिर्फ एक व्यक्ति की शिकायत नहीं,

बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और न्याय की परीक्षा बन चुका है।

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