
कृषि भूमि का गैर-कृषि में रूपांतरण खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर
राज्यसभा सांसद प्रो. डॉ. मेधा कुलकर्णी ने शून्यकाल में उठाया मुद्दा, कृषि भूमि संरक्षण की मांग
रिपोर्ट: विशाल समाचार
स्थान: पुणे महाराष्ट्र
पुणे: देश में तेजी से कृषि भूमि का गैर-कृषि उपयोग में बदलना खाद्य सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा बनता जा रहा है। कृषि प्रधान देश भारत में खेती योग्य जमीन का लगातार कम होना चिंताजनक है। 140 करोड़ लोगों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कृषि भूमि का संरक्षण बेहद जरूरी है, यह स्पष्ट मत राज्यसभा सांसद प्रो. डॉ. मेधा कुलकर्णी ने संसद में शून्यकाल के दौरान व्यक्त किया।
प्रो. कुलकर्णी ने कहा कि देश के कई शहरों और जिलों में कृषि भूमि की प्लॉटिंग कर आवासीय परियोजनाएं बनाई जा रही हैं, जिससे खेती योग्य क्षेत्र में लगातार कमी आ रही है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि पंजाब में पिछले कुछ वर्षों में एक लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन को गैर-कृषि घोषित किया गया है। वर्तमान में भारत में लगभग 45 प्रतिशत भूमि ही खेती के अधीन है, जिसमें करीब 9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यदि यही स्थिति जारी रही, तो इसका असर खाद्य सुरक्षा, किसानों की आजीविका, जीएसटी राजस्व और पर्यावरण संतुलन पर पड़ेगा।
उन्होंने एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि यदि जनसंख्या में 1 प्रतिशत की वृद्धि होती है, तो कृषि भूमि में 0.45 प्रतिशत की कमी आती है।
प्रो. कुलकर्णी ने किसानों से अपील की कि वे अपनी कृषि भूमि को सुरक्षित रखें और आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे संरक्षित करें। साथ ही आधुनिक तकनीक, उन्नत बीज, सूक्ष्म सिंचाई और सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया।
उन्होंने यह भी मांग की कि कृषि भूमि का गैर-कृषि उपयोग केवल सार्वजनिक हित के बड़े बुनियादी परियोजनाओं तक सीमित होना चाहिए। उपजाऊ भूमि के संरक्षण के लिए सख्त कानून बनाए जाएं और भूमि उपयोग में बदलाव पर सैटेलाइट व डिजिटल तकनीक के माध्यम से निगरानी रखी जाए।
इसके अलावा, यदि किसी किसान को मजबूरी में अपनी जमीन बेचनी पड़े, तो सरकार उचित मुआवजा देकर उस भूमि को खरीदे और उसका उपयोग केवल कृषि के लिए ही सुनिश्चित करे।
उन्होंने अंत में कहा कि भविष्य में कृषि क्षेत्र एक महत्वपूर्ण उद्योग के रूप में उभरेगा, इसलिए इसका संरक्षण और संवर्धन समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

