बंगाल की अस्मिता को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाना चाहती हैं ममता
रिपोर्ट: अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
स्थान: लखनऊ उत्तर प्रदेश
पश्चिम बंगाल की चुनावी जमीन पर तनाव भरा माहौल छाया हुआ है। सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व वाली ममता बनर्जी अपनी कुर्सी बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही हैं, जबकि भारतीय जनता पार्टी सत्ता हासिल करने के सपने बुन रही है। इस बार की लड़ाई 2021 वाली जंग से बिल्कुल अलग नजर आ रही है। पहले के चुनावों में हिंसा का तांडव देखने को मिला था, जहां दंगाइयों को खुला संरक्षण मिला। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। कानून की सख्ती ने उपद्रवियों की हिम्मत तोड़ दी है। अर्धसैनिक बलों के जवान हर कोने में मुस्तैद हैं, जो किसी भी तरह की गुंडागर्दी को कुचलने को तैयार हैं। चुनाव आयोग ने शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। इन बदलावों से ममता बनर्जी का गुस्सा भड़क उठा है। वे खुद को पीड़ित साबित करने की कोशिश कर रही हैं, जो उनकी पुरानी चाल है।
चुनावी जंग की शुरुआत होते ही पश्चिम बंगाल की सड़कों पर उत्तेजना का माहौल बन गया। 2021 में जो दृश्य देखे गए थे, वे भयानक थे। तब तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने हिंसा का सहारा लिया। रामनवमी के जुलूस पर हमले हुए, घरों को आग लगाई गई, और निर्दोष लोगों को निशाना बनाया गया। पुलिस ने आंखें मूंद लीं। लेकिन इस बार सब कुछ अलग है। केंद्र सरकार ने अर्धसैनिक बलों को भारी संख्या में तैनात किया। ये जवान सीधी कार्रवाई करने से नहीं हिचकते। कोलकाता के एक इलाके में जब गुंडों ने मतदान केंद्र के पास उपद्रव मचाने की कोशिश की, तो जवानों ने तुरंत लाठियां भांजीं। पांच उपद्रवी घायल हो गए और उन्हें हिरासत में ले लिया गया। इससे आसपास का इलाका शांत हो गया। एक अन्य घटना में दक्षिण 24 परगना जिले के एक गांव में तृणमूल समर्थकों ने भाजपा कार्यकर्ताओं को घेर लिया। लेकिन अर्धसैनिक बल ने फटाक से हस्तक्षेप किया। हवा में गोली चलाई गई और गुंडे भाग खड़े हुए। इन उदाहरणों से साफ है कि कानून अब किसी की सुनता नहीं।
ममता बनर्जी को ये सख्ती रास नहीं आ रही। वे हर मौके पर चिल्ला रही हैं कि केंद्र चुनाव में दखल दे रहा है। एक रैली में उन्होंने रोते हुए कहा कि उनके राज्य पर हमला हो रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि अर्धसैनिक बल निष्पक्ष तरीके से काम कर रहे हैं। वे तृणमूल के गुंडों पर भी उतनी ही सख्ती दिखा रहे हैं जितनी किसी और पर। उदाहरण के तौर पर हावड़ा में एक तृणमूल नेता ने पुलिस अधिकारी को धमकाया। अधिकारी ने शिकायत की, तो अर्धसैनिक बल ने उस नेता को मौके पर गिरफ्तार कर लिया। ममता ने इसे राजनीतिक साजिश करार दिया। वे कहती हैं कि उनके कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है। लेकिन आंकड़े कुछ और कहते हैं। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में दर्ज है कि इस बार हिंसा की घटनाएं 2021 के मुकाबले 70 प्रतिशत कम हुई हैं। मतदान केंद्रों पर कोई बड़ा उपद्रव नहीं हुआ। यह सब अर्धसैनिक बल की मौजूदगी का नतीजा है।
चुनाव आयोग भी पीछे नहीं हट रहा। आयोग ने हर जिले में विशेष टीम गठित की हैं। ये टीमें रात-दिन गश्त कर रही हैं। एक बार उत्तर दिनाजपुर में एक जज को तृणमूल कार्यकर्ताओं ने घेर लिया। जज निर्वाचन प्रक्रिया की निगरानी कर रहे थे। कार्यकर्ता चिल्ला रहे थे कि जज पक्षपाती हैं। लेकिन अर्धसैनिक बल ने तुरंत पहुंचकर जज को सुरक्षित निकाला और आठ लोगों को पकड़ लिया। जज ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि अगर ये जवान न होते, तो हालात बिगड़ जाते। इसी तरह मालदा में एक पुलिस अधिकारी को धमकी मिली। अधिकारी मतपेटियों की गिनती करवा रहे थे। गुंडों ने उन्हें घेरा, लेकिन जवानों ने डंडों की बौछार कर दी। तीन गुंडे अस्पताल पहुंचे। ये उदाहरण बताते हैं कि अब कानून का राज है। जज और अधिकारी सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। पहले वे डरते थे, अब वे बेधड़क काम कर पा रहे हैं।
ममता बनर्जी इस स्थिति से तिलमिला रही हैं। उनका पारा चढ़ा हुआ है। वे हर सभा में केंद्र को कोसती हैं। कहती हैं कि दिल्ली वाले उनके राज्य को बर्बाद कर देंगे। लेकिन उनकी यह चाल उल्टी पड़ रही है। जनता अब उनकी नाटकबाजी समझ रही है। विक्टिम कार्ड खेलने का उनका तरीका पुराना है। 2021 में भी उन्होंने यही किया था। तब हिंसा के बाद वे रो-रोकर टीवी पर आईं और खुद को मां बताते हुए वोट मांगे। कहा कि बेटे को बचाओ। इस बार भी वही फॉर्मूला अपना रही हैं। कोलकाता की एक सभा में वे घुटने मोड़कर बैठ गईं। आंसू बहाते हुए बोलीं कि उन्हें कुर्सी से हटाने की साजिश चल रही है। उनके समर्थक चिल्लाने लगे। लेकिन भाजपा कार्यकर्ता हंस पड़े। सोशल मीडिया पर उनके वीडियो वायरल हो गए। लोग कह रहे हैं कि यह नौटंकी है। एक और उदाहरण लीजिए। जब अर्धसैनिक बल ने उनके एक विधायक को पकड़ा, तो ममता ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। कहा कि विधायक निर्दोष हैं, उन पर झूठा केस बनाया गया। लेकिन जांच में पता चला कि विधायक ने ही हिंसा भड़काई थी। आयोग ने उसे अयोग्य घोषित कर दिया। ममता ने फिर विक्टिम बनने की कोशिश की। कहा कि न्याय व्यवस्था उनके खिलाफ है।
इसके अलावा ममता भक्तों को भड़काने से नहीं चूक रही हैं। वे कहती हैं कि बंगाल की बेटी पर अत्याचार हो रहा है। लेकिन जनता जाग चुकी है। 2021 में वे सफल रहीं क्योंकि हिंसा का डर था। अब डर खत्म हो गया। अर्धसैनिक बल ने गुंडों की कमर तोड़ दी। एक सर्वे में सामने आया कि 60 प्रतिशत मतदाता शांतिपूर्ण चुनाव से खुश हैं। वे ममता की गुंडागर्दी से तंग आ चुके हैं। उदाहरण स्वरूप, आसनसोल में एक महिला मतदाता ने कहा कि पहले डर लगता था, अब बेझिझक वोट दे सकी। इसी तरह पुरुलिया के एक युवक ने बताया कि उसके भाई को 2021 में पीटा गया था। इस बार सब शांत रहा। ये बदलाव ममता के लिए खतरे की घंटी हैं। उनका विक्टिम कार्ड अब फेल हो रहा है। वे खुद को पीड़ित बताकर वोट बटोरना चाहती हैं, लेकिन लोग सच्चाई जान चुके हैं।
चुनावी माहौल में और भी रोचक घटनाएं घटीं। बांकुरा जिले में तृणमूल ने फर्जी वोटिंग की कोशिश की। लेकिन चुनाव आयोग की टीम ने पकड़ लिया। अर्धसैनिक बल ने मौके पर छापा मारा। 20 लोग गिरफ्तार हुए। ममता ने इसे साजिश कहा। लेकिन सबूतों ने उन्हें झूठा साबित कर दिया। हुगली में एक जज को धमकी भरा फोन आया। जज ने आयोग को सूचना दी। जवानों ने फोन करने वाले को ट्रेस कर पकड़ लिया। वह तृणमूल का स्थानीय नेता निकला। ममता ने चुप्पी साध ली। इन घटनाओं से साफ है कि सख्ती काम कर रही है। उपद्रव करने वालों को सबक मिल रहा है। जज और अधिकारी अब बिना डरे काम कर रहे हैं।
ममता का विक्टिम कार्ड खेलने का तरीका बहुत साफ है। वे हर घटना को अपने खिलाफ साजिश बताती हैं। रोना-धोना शुरू कर देती हैं। समर्थकों को उकसाती हैं। कहती हैं कि बंगाल की अस्मिता खतरे में है। लेकिन इस बार यह चाल चल नहीं रही। जनता देख रही है कि अर्धसैनिक बल ने कैसे शांति लाई। 2021 के दंगों की यादें ताजा हैं। लोग हिंसा से त्रस्त थे। अब वे शांत चुनाव चाहते हैं। ममता का गुस्सा इसी से भड़कता है। वे जानती हैं कि सत्ता खिसक रही है। भाजपा का माहौल मजबूत हो गया है। कार्यकर्ता बिना डर के प्रचार कर रहे हैं। कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल की यह चुनावी जंग लोकतंत्र की जीत बन रही है। अर्धसैनिक बल और चुनाव आयोग की सख्ती ने हिंसा को जड़ से उखाड़ फेंका। ममता बनर्जी का विक्टिम कार्ड फेल हो गया। उदाहरण गिनाने को तो बहुत हैं। हर जिले से ऐसी कहानियां आ रही हैं। जनता अब सच्चाई चुन रही है। यह बदलाव ऐतिहासिक है। बंगाल की धरती पर शांति का राज कायम हो रहा है।



