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दिल्ली उच्च न्यायालय का आदेश: BRICS CCI में धोखाधड़ी, दस्तावेज़ दबाने और अवैध चुनाव के आरोपों पर रजिस्ट्रार को आवेदन पर विचार करने का निर्देश

दिल्ली उच्च न्यायालय का आदेश: BRICS CCI में धोखाधड़ी, दस्तावेज़ दबाने और अवैध चुनाव के आरोपों पर रजिस्ट्रार को आवेदन पर विचार करने का निर्देश

रिपोर्ट: विशाल समाचार 

स्थान: नई दिल्ली, 

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 24 अप्रैल 2026 को W.P.(C) 5592/2026 (अशुतोष लांडगे बनाम भारत संघ एवं अन्य) मामले में एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए सोसाइटी रजिस्ट्रार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के आवेदन पर विधि के अनुसार उचित विचार किया जाए।

कौन हैं याचिकाकर्ता?

याचिकाकर्ता अशुतोष लांडगे, BRICS CCI चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (BRICS CCI) के गवर्निंग बॉडी सदस्य एवं आईटी एवं संचार वर्टिकल के अध्यक्ष हैं। उन्होंने 07 अप्रैल 2026 को सोसाइटी रजिस्ट्रार के समक्ष एक औपचारिक आवेदन दायर कर संगठन में व्याप्त वित्तीय धोखाधड़ी, शासन संबंधी अनियमितताओं और दस्तावेज़ों को दबाने के गंभीर आरोप उठाए थे।

पाँच महीने से दस्तावेज़ रोके गए

याचिकाकर्ता के अनुसार, BRICS सीसीआई के महत्वपूर्ण वित्तीय अभिलेख और शासन संबंधी दस्तावेज़ पिछले पाँच महीनों से अधिक समय से उनसे जानबूझकर छुपाए जा रहे हैं, जबकि वे बारंबार औपचारिक मांग कर चुके हैं। उनका कहना है कि यह दस्तावेज़ दबाने की कार्रवाई संगठन में हो रहे वित्तीय कुप्रबंधन और अनियमितताओं की जाँच को रोकने का सुनियोजित प्रयास है।

अपंजीकृत एमओए के तहत चुनाव — कानूनी रूप से अवैध

याचिकाकर्ता ने यह भी गंभीर आरोप लगाया है कि BRICS CCI सीसीआई का नेतृत्व वर्ष 2012 के बाद संशोधित एमओए (ज्ञापन पत्र) के आधार पर चुनाव कराने की प्रक्रिया में है, जबकि यह संशोधित एमओए सोसाइटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम, 1860 की धारा 12 के अंतर्गत रजिस्ट्रार के पास पंजीकृत ही नहीं है।

कानूनी दृष्टि से, बिना पंजीकरण के संशोधित एमओए का कोई विधिक अस्तित्व नहीं है और वह शून्य एवं अप्रभावी है। ऐसे में उस अपंजीकृत एमओए के अंतर्गत कराए जाने वाले किसी भी चुनाव को कानूनी रूप से वैध नहीं माना जा सकता। याचिकाकर्ता का स्पष्ट मत है कि अंतिम विधिवत पंजीकृत एमओए ही संगठन का एकमात्र वैध शासन दस्तावेज़ है।

न्यायालय का आदेश

माननीय न्यायमूर्ति ने आदेश में दर्ज किया कि याचिकाकर्ता ने पहले ही रजिस्ट्रार के समक्ष 07.04.2026 को आवेदन दाखिल किया है और उस आवेदन पर उचित विचार होना आवश्यक है। न्यायालय ने तदनुसार रिट याचिका का निस्तारण करते हुए स्पष्ट निर्देश दिया कि रजिस्ट्रार याचिकाकर्ता के आवेदन पर विधि के अनुसार विचार करें और उसका निराकरण करें।

आदेश का महत्व

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यद्यपि यह आदेश निस्तारण स्वरूप का है, तथापि इसका व्यावहारिक महत्व अत्यधिक है। अब रजिस्ट्रार पर न्यायालय के निर्देशानुसार याचिकाकर्ता की शिकायतों — धोखाधड़ी, दस्तावेज़ दबाने और अवैध चुनाव प्रक्रिया — की जाँच करने की विधिक बाध्यता उत्पन्न हो गई है। अब रजिस्ट्रार की किसी भी प्रकार की निष्क्रियता कानूनी रूप से अस्वीकार्य होगी।

याचिकाकर्ता की ओर से श्री निशांत शर्मा एवं सुश्री अद्वितीया, अधिवक्तागण उपस्थित रहे। प्रतिवादियों की ओर से केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिवक्ता सहित अन्य पक्षकारों के अधिवक्ता उपस्थित रहे।

 

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