
लाड़ली बहना योजना पर बड़ा घोटाला या प्रशासनिक लापरवाही?
लाखों महिलाओं की किस्त बंद, सरकार जवाब दे — आखिर दोषी कौन?
पुणे/मुंबई | विशेष संवाददाता
महाराष्ट्र सरकार की बहुचर्चित “लाड़ली बहना योजना” अब सवालों के घेरे में आ गई है। जिन महिलाओं को आर्थिक सहारा देने के बड़े-बड़े दावे किए गए थे, वही महिलाएं आज 6–7 महीनों से अपनी किस्त के लिए बैंक और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर लाखों महिलाओं की किस्त किस आधार पर रोकी गई? और यदि सत्यापन अभियान चलाया गया, तो उसकी प्रक्रिया सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरों तक महिलाएं आरोप लगा रही हैं कि बिना स्पष्ट सूचना दिए उनके नाम सूची से हटा दिए गए। कहीं ई-केवाईसी का बहाना, कहीं दस्तावेज सत्यापन का बहाना और कहीं “नाम सूची में नहीं” कहकर महिलाओं को वापस भेजा जा रहा है।
महिलाओं का कहना है कि आधार, बैंक खाता, वोटर आईडी और अन्य दस्तावेज सही होने के बावजूद भुगतान बंद कर दिया गया। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार की व्यवस्था खुद अव्यवस्थित है या फिर पात्र महिलाओं के साथ अन्याय हो रहा है?
चुनावी वादों की योजना बनी महिलाओं की परेशानी?
जिस योजना को महिला सशक्तिकरण का बड़ा कदम बताया गया था, वही अब महिलाओं के लिए मानसिक और आर्थिक परेशानी का कारण बनती दिख रही है।
कई परिवारों में यह राशि घरेलू खर्च, बच्चों की पढ़ाई और दवाइयों के लिए सहारा थी। लगातार कई महीनों से पैसा न आने से गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर सीधा असर पड़ा है।
मुख्यमंत्री से सीधे सवाल
अब सवाल सीधे मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र सरकार पर उठ रहे हैं—
आखिर सत्यापन का मापदंड क्या था?
कितनी महिलाओं को अपात्र घोषित किया गया?
कितनी पात्र महिलाओं का भुगतान गलती से रोका गया?
क्या सरकार इस पूरी प्रक्रिया का डेटा सार्वजनिक करेगी?
जिन महिलाओं की किस्त रुकी है, उनकी समस्या का समाधान कब होगा?
पारदर्शिता नहीं तो भरोसा कैसे?
लाभार्थियों का आरोप है कि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता की भारी कमी है। महिलाओं को न कोई लिखित सूचना दी जा रही है, न स्पष्ट कारण बताया जा रहा है।
ऐसे में विपक्ष और सामाजिक संगठनों ने भी सरकार से जवाब मांगना शुरू कर दिया है।
अब देखने वाली बात होगी कि महाराष्ट्र सरकार इस बढ़ते असंतोष पर क्या कदम उठाती है और लाखों महिलाओं को राहत कब मिलती है।


