
‘वारी‘ : बंधुत्व और मानवता का महासम्मेलन
पंढरपुर के विठुराय की आषाढ़ी वारी विश्व की सबसे अनूठी आध्यात्मिक परंपराओं में से एक है। यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि मानवीय पवित्रता, समानता और भाईचारे का विराट उत्सव है। सदियों से लाखों श्रद्धालु पैदल चलकर भगवान विठ्ठल के दर्शन के लिए पंढरपुर पहुँचते रहे हैं। मान्यता है कि भक्त पुंडलिक की निष्काम सेवा और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विठ्ठल आज भी ईंट (विट) पर खड़े होकर अपने भक्तों की प्रतीक्षा करते हैं। यह कथा इस सत्य का प्रतीक है कि भगवान के लिए सबसे प्रिय शुद्ध और निष्कपट भक्ति है।
भारतीय संत परंपरा ने सदैव मानव कल्याण, सामाजिक समरसता और विश्व शांति का संदेश दिया है। आज जब दुनिया युद्ध, हिंसा और वैमनस्य जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब वैश्विक स्तर पर भाईचारे और शांति की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। ऐसे समय में लाखों लोगों को प्रेम, श्रद्धा और समानता के सूत्र में बाँधने वाली पंढरपुर की वारी वास्तव में बंधुत्व और मानवता का महासम्मेलन है।
अक्सर अधिक शिक्षा या ज्ञान के साथ मनुष्य में अहंकार आने की संभावना बढ़ जाती है। ज्ञान स्वयं अहंकार नहीं देता, बल्कि ज्ञान के कारण उत्पन्न होने वाला कथित श्रेष्ठता-बोध व्यक्ति को अहंकारी बना देता है। यही अहंकार अंततः विनाश का कारण बनता है। किंतु विठ्ठल की वारी में सभी वारकरी अपना ज्ञान, पद, प्रतिष्ठा और अहंकार त्यागकर केवल एक साधारण भक्त के रूप में सम्मिलित होते हैं। यही वारी की सबसे बड़ी विशेषता है।
संत तुकाराम महाराज ने कहा है—
“जो दुखियों और पीड़ितों को अपना मानता है, वही सच्चा संत है; वहीं ईश्वर का वास होता है।”
पीड़ितों और वंचितों को अपनाने वाले विठोबा सामाजिक न्याय और करुणा के प्रतीक हैं। वारी किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करती। जाति, वर्ग, लिंग, धन और पद के सभी भेद मिटाकर यह मानवता, समता और बंधुत्व का संदेश देती है। यही कारण है कि भारतीय संत साहित्य की महान परंपरा और “विश्वात्मके पसायदान” की संस्कृति आज भी जीवंत बनी हुई है।
जब लाखों श्रद्धालु पैदल चलते हुए भगवान के दर्शन के लिए निकलते हैं, तब वे एक-दूसरे के साथ भाईचारे और आत्मीयता का व्यवहार करते हैं। इस यात्रा में प्रत्येक वारकरी दूसरे के लिए “माऊली” अर्थात् करुणा और स्नेह का स्वरूप बन जाता है।
वारी समता की ऐसी जीवंत परंपरा है, जहाँ छोटे-बड़े, स्त्री-पुरुष, धनी-निर्धन और सभी जाति-समुदाय के लोग एक साथ हरिनाम का संकीर्तन करते हुए समानता का आदर्श प्रस्तुत करते हैं।
इस प्रकार पंढरपुर की वारी हमें समता, समानता, बंधुत्व, सम्मान, स्नेह, प्रेम, भक्ति, सामाजिक एकता और मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत दर्शन कराती है। एक-दूसरे के चरण स्पर्श कर सम्मान व्यक्त करने की यह परंपरा मनुष्य को विनम्रता और उदारता का पाठ पढ़ाती है।
इसीलिए कहा जा सकता है कि विश्व शांति और मानवता की स्थापना का सबसे प्रभावी मार्ग पंढरपुर की वारी ही है।
— विक्रम मालन आप्पासो शिंदे
कवि, लेखक एवं साहित्यकार
मो.: 7743884307


