पूणेमहाराष्ट्रशिक्षा

गोपनीय जानकारी की सुरक्षा साइबर जगत के सामने सबसे बड़ी चुनौती: विशेषज्ञ

गोपनीय जानकारी की सुरक्षा साइबर जगत के सामने सबसे बड़ी चुनौती: विशेषज्ञ

 

‘इन्वेस्टिगेशन मास्टरक्लास’ का दूसरा दिन, साइबर सुरक्षा पर विशेषज्ञों ने दिए महत्वपूर्ण सुझाव

रिपोर्ट: विशाल समाचार 

स्थान:पुणे महाराष्ट्र 

पुणे: बदलते समय के साथ साइबर हमलों और साइबर अपराधों का स्वरूप लगातार जटिल होता जा रहा है। अब साइबर हमले केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि गोपनीय और संवेदनशील जानकारी चुराने के उद्देश्य से भी बड़े पैमाने पर किए जा रहे हैं। ऐसे में भविष्य में गोपनीय जानकारी की सुरक्षा साइबर क्षेत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी। यह बात साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों ने कही।

 

ट्रान्सेंडेंटल टेक्नोलॉजीज, सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के प्रौद्योगिकी विभाग (डीओटी-एसएसपीयू) तथा पुनीत बालन ग्रुप के संयुक्त तत्वावधान में विश्वविद्यालय के जियोलॉजी विभाग में आयोजित ‘इन्वेस्टिगेशन मास्टरक्लास’ के दूसरे दिन साइबर सुरक्षा विषयक कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस दौरान वरिष्ठ साइबर विशेषज्ञ अमलेश मेंढेकर और कुणाल पाटील ने भविष्य में गोपनीय जानकारी की सुरक्षा और साइबर अपराधों से निपटने के आधुनिक तरीकों पर प्रशिक्षण दिया। कार्यक्रम में ट्रान्सेंडेंटल टेक्नोलॉजीज के प्रमुख केतन अत्रे भी उपस्थित रहे।

 

अमलेश मेंढेकर ने कहा कि व्यक्तिगत उपयोग से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा तक तकनीक का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, वहीं साइबर हमलों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में दुनिया में हर 39 सेकंड में एक सफल साइबर हमला होता है और प्रतिदिन लगभग 5.6 लाख नए मालवेयर तैयार किए जाते हैं। ऐसे में पारंपरिक सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं हैं। साइबर हमलों की रोकथाम और उनकी जांच के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का व्यापक उपयोग समय की आवश्यकता है।

 

उन्होंने कहा कि पहले एआई का उपयोग करने के लिए कोडिंग का ज्ञान आवश्यक होता था, लेकिन अब सामान्य भाषा में भी एआई से संवाद संभव है। इससे जहां तकनीक का उपयोग आसान हुआ है, वहीं साइबर अपराधों की संख्या और उनकी जटिलता भी बढ़ी है। इसलिए जांच एजेंसियों और संबंधित अधिकारियों को आधुनिक तकनीकों का निरंतर प्रशिक्षण लेना जरूरी है।

 

कुणाल पाटील ने कहा कि जांच एजेंसियों के कर्मचारियों पर काम का अत्यधिक दबाव है और गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण तथा आधुनिक संसाधनों की भी कमी है। साइबर अपराधों की जांच में यह बड़ी चुनौती है। उन्होंने बताया कि अक्सर किसी साइबर अपराध का खुलासा होने से 6 महीने से 1 वर्ष पहले अपराधी उसकी योजना और तैयारी कर चुके होते हैं। जब तक अपराध सामने आता है, तब तक तकनीक भी काफी बदल चुकी होती है। इसलिए जांच एजेंसियों को लगातार नई तकनीकों के अनुरूप खुद को अपडेट रखना आवश्यक है।

 

कार्यशाला में रोहन बनकर ने सोशल मीडिया और साइबर अपराध जांच, कर्नल संभव खुगशाल ने सूचना प्रौद्योगिकी एवं जीआरसी, कुलदीप सोनार ने डार्क वेब की जांच तथा पैट्रीसिया शिफुनेस ने साइबर क्राइम इन्वेस्टिगेशन विषय पर विस्तृत मार्गदर्शन दिया।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button