
आरक्षण हक है, सामाजिक न्याय पूर्ण होने तक इसकी आवश्यकता : डॉ. हुलगेेश चलवादी
रिपोर्ट :विशाल समाचार
स्थान: पुणे महाराष्ट्र
पुणे,। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत द्वारा आरक्षण को लेकर व्यक्त की गई भूमिका पर रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के प्रदेश उपाध्यक्ष एवं बहुजन नेता डॉ. हुलगेेश चलवादी ने संयमित प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि आरक्षण केवल अस्थायी रियायत नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता और भेदभाव को दूर करने के लिए भारतीय संविधान द्वारा प्रदान किया गया अधिकार और संवैधानिक संरक्षण है।
डॉ. चलवादी ने कहा कि समाज में सामाजिक भेदभाव अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। वंचित, शोषित और पिछड़े वर्गों को आज भी शिक्षा, रोजगार, प्रतिनिधित्व और सामाजिक सम्मान के क्षेत्रों में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में जब तक सामाजिक न्याय का लाभ समाज के अंतिम वंचित व्यक्ति तक नहीं पहुंचता, तब तक आरक्षण की आवश्यकता बनी रहेगी।
मोहन भागवत द्वारा सामाजिक भेदभाव के अस्तित्व में रहने तक आरक्षण की आवश्यकता बताए जाने को स्वागतयोग्य बताते हुए डॉ. चलवादी ने कहा कि आरक्षण को केवल सामाजिक उत्थान के साधन अथवा कुछ समय बाद समाप्त होने वाली व्यवस्था के रूप में देखना उचित नहीं होगा। उन्होंने कहा कि आरक्षण भारतीय संविधान द्वारा वंचित समाज के घटकों को दिया गया अधिकार है और यह सामाजिक समानता तथा न्याय स्थापित करने के व्यापक संवैधानिक उद्देश्य से जुड़ा हुआ है।
आरक्षण का लाभ प्राप्त कर चुके व्यक्तियों द्वारा अन्य लोगों को अवसर देने की भावना से व्यापक रूप से सहमति जताते हुए डॉ. चलवादी ने कहा कि इस विषय को एक अलग दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, “किसी एक व्यक्ति को आरक्षण का लाभ मिलने से उसके पूरे समाज का सामाजिक पिछड़ापन समाप्त नहीं हो जाता। व्यक्ति की प्रगति और पूरे समाज की सामाजिक स्थिति दो अलग-अलग विषय हैं। इसलिए आरक्षण के प्रश्न को केवल व्यक्तिगत लाभ के दायरे में नहीं देखा जा सकता।”
डॉ. चलवादी ने कहा कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने सामाजिक असमानता दूर करने के लिए संविधान के माध्यम से समानता, न्याय और प्रतिनिधित्व का मार्ग दिखाया। इसलिए आरक्षण से संबंधित किसी भी चर्चा में संविधान की मूल भावना को केंद्र में रखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जब तक समाज का अंतिम वंचित वर्ग शिक्षा, रोजगार, प्रशासन और सत्ता की प्रक्रिया में समान स्तर पर नहीं पहुंच जाता, तब तक आरक्षण की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता।
डॉ. चलवादी ने स्पष्ट किया कि आरक्षण का उद्देश्य किसी भी समाज या वर्ग के साथ अन्याय करना नहीं है। इसका मूल उद्देश्य ऐतिहासिक और सामाजिक असमानता के कारण पैदा हुई दूरी को कम करना तथा समान अवसर उपलब्ध कराना है।
उन्होंने कहा कि आरक्षण समाप्त करने की चर्चा करने के बजाय समाज को यह विचार करना चाहिए कि जिस दिन समाज के अंतिम वंचित व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के समान अवसर, सम्मान और प्रतिनिधित्व प्राप्त होगा, उस दिन आरक्षण की आवश्यकता रहेगी या नहीं।
डॉ. हुलगेेश चलवादी ने यह भी अपेक्षा व्यक्त की कि आरक्षण के माध्यम से वंचित वर्गों को प्राप्त अवसरों का विस्तार व्यापक सामाजिक न्याय के रूप में होना चाहिए। साथ ही, आरक्षण को लेकर समाज में भ्रम और गलतफहमियां पैदा करने के बजाय संविधान की भावना और संवैधानिक दायरे में सकारात्मक एवं सार्थक चर्चा होनी चाहिए।


