
रीवा: रीवा जिले सहित संभाग में लिंगानुपात में लगातार गिरावट आ रही है। भ्रूण लिंग परीक्षण को रोकने के लिए पीसी एण्ड पीएनडीटी एक्ट में कठोर प्रावधान किए गए हैं। इसमें परीक्षण कराने वाले तथा परीक्षण करने वाले दोनों के लिए जेल भेजने और जुर्माने की सजा है। एक्ट के संबंध में संभागीय कार्यशाला में प्रशिक्षण दिया गया। कार्यशाला होटल विन्ध्या रिट्रीट में आयोजित की गई। कार्यशाला का शुभारंभ संयुक्त संचालक स्वास्थ्य डॉ. प्रमोद पाठक ने किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि एक्ट के प्रावधानों का व्यापक प्रचार-प्रसार आवश्यक है। भ्रूण लिंग परीक्षण एवं भ्रूण हत्या जैसे अपराध रोकने के लिए व्यक्ति, परिवार एवं समाज के दृष्टिकोण में परिवर्तन आवश्यक है। इसके लिए प्रशासन के साथ-साथ पूरे समाज को भी प्रयास करना होगा।
कार्यशाला में राज्य स्तरीय काउंसलर एवं प्रशिक्षक डॉ. विद्या पाण्डेय ने एक्ट के प्रावधानों, व्यावहारिक कठिनाईयों एवं एक्ट के प्रावधानों को लागू करने के लिए व्यावहारिक उपायों की जानकारी दी। डॉ. पाण्डेय ने कहा कि भ्रूण लिंग परीक्षण हर दृष्टि से जघन्य अपराध है। भ्रूण लिंग परीक्षण कराना वैधानिक, नैतिक तथा सामाजिक अपराध है। अब समय आ गया है कि चिकित्सक तथा समाज का हर व्यक्ति बेटे एवं बेटियों के प्रति सही दृष्टिकोण बनाए। इसके लिए समाज में व्यापक जन जागरण अभियान चलाना पड़ेगा। प्रत्येक जिले में गठित सलाहकार समिति के सदस्य एक्ट के प्रावधानों को कठोरता से लागू कराने के लिए नियमित रूप से नर्सिंग होमों का निरीक्षण करें। उनमें यदि प्रावधानों का उल्लंघन पाया जाता है तो विहित प्राधिकारी कलेक्टर महोदय के समक्ष प्रकरण प्रस्तुत कर दण्डात्मक कार्यवाही करवाएं।
डॉ. पाण्डेय ने कहा कि पीसी एण्ड पीएनडीटी एक्ट यानी गर्भधारण पूर्व एवं प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम 1994 में बनाया गया। इसके तहत कलेक्टर की अध्यक्षता में हर जिले में आठ सदस्यीय सलाहकार समिति कार्य कर रही है। समिति में महिला कल्याण तथा वैधानिक जानकारी रखने वाले व्यक्तियों को भी शामिल किया गया है। जिस नर्सिंग होम में सोनोग्राफी मशीन स्थापित है वहाँ एक्ट की प्रति रखना आवश्यक है। जिस महिला की जांच की जाती है उसका नाम, डाक का पूरा पता तथा मोबाइल नम्बर दर्ज करना अनिवार्य है। गर्भस्थ शिशु की जांच के कारण का भी स्पष्ट उल्लेख आवश्यक है। ऐसा न करना एक्ट का उल्लंघन होगा। यदि किसी महिला की प्रथम अथवा प्रथम दो संतानें कन्या हैं तो जांच कराने के बाद उसका हर सप्ताह फॉलोअप लेना आवश्यक है। इसी तरह यदि कोई महिला गर्भ की जांच कराने के लिए आती है तो उसकी जीवित संतानों का विवरण एवं सही आयु भी दर्ज करना अनिवार्य है। सलाहकार समिति के सदस्य निरीक्षण के समय इनकी जानकारी ले सकते हैं।
कार्यशाला में डॉ. पाण्डेय ने बताया कि 1961 में भारत का लिंगानुपात 976 था। यह 2011 में घटकर 919 हो गया। देश में सोनोग्राफी मशीन का उपयोग 1984 के आसपास शुरू हुआ। उसके बाद से शहरी क्षेत्र में महिला एवं पुरूष लिंगानुपात में तेजी से आई गिरावट ने इस बात को प्रमाणित किया कि हमारा समाज प्रकृति के विरूद्ध निरंतर अपराध कर रहा है। इसे रोकने के लिए 1994 में एक्ट बनाया गया। अधिनियम बनने के बाद स्थितियों में सुधार हुआ है लेकिन अभी बहुत प्रयास की आवश्यकता है। अभी भी अधिकतर परिवारों में पुत्र की चाह, बेटियों को समुचित मान न देना तथा महिलाओं के प्रति उपेक्षा जैसी सामाजिक बुराईयां हैं। इन्हें दूर करने के लिए समाज को ही आगे आना होगा। कार्यशाला में एक्ट के प्रावधानों, सलाकार समिति के सदस्यों के अधिकार, सलाहकार समिति की नियमित बैठक, जन जागरूकता अभियान तथा चिकित्सकों एवं नर्सिंग होम संचालकों की प्रशिक्षण कार्यशाला के संबंध में जानकारी दी गई। कार्यशला में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. बीएल मिश्रा, उप संचालक डॉ. एनपी पाठक, उप संचालक डॉ. संजीव शुक्ला, उप संचालक डॉ. डीपी अग्रवाल, डॉ. आरपी सोनी अनूपपुर, डॉ. सुनील पाण्डेय सतना, सामाजिक कार्यकर्ता विक्रांत द्विवेदी, सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. मुकेश येंगल, स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रतिभा मिश्रा, किरण त्रिपाठी एवं रीवा तथा शहडोल संभाग के विभिन्न जिलों के चिकित्सक उपस्थित रहे।

