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शनिदेव न्याय के देवता नहीं हैं ..!

शनिदेव न्याय के देवता नहीं हैं (HEADLINE)

विश्वप्रसिद्ध ज्योतिष्याचार्य सिद्धांत सहगल जी ज्योतिष में चल रही गलत बयानी पर अपनी बात खुलकर रखते हुए कहते हैं कि
शनि पर कई आलेख आ रहे हैं शनि की साढ़ेसाती सम्बंधित -जहाँ सबसे पहली ये गलत-बयानी की शनि देव न्याय के देवता है -९०% लोगो के दिमाग ज्योतिष के बाज़ारवाद की वजह से ये बात दिमाग में बैठ गई है कि शनिदेव ”न्याय के देवता हैं”-शायद ”मैं दुनिया का अकेला आदमी भी हूँ जो शनि को न्याय का कारक नहीं मानता”… यहाँ भीड़ में अकेला पड़ने का खतरा तो है ही,मगर ये रिवाज या विचार आया कहांसे कि शनि न्याय का देवता है? क्योंकि शनिदेव दुःख का कारक है और अपनी दशा या गोचर में तकलीफ देतें है इसलिए जब दुःख मिलते हैं लोग इसे अपने कर्मो के फल के तौर पर मान लेते है और ये समझने लगते हैं कि शनिदेव न्याय कर रहे हैं शनि पर एक्सपर्ट कुछ ऐसे लोगो से भी पाला पड़ा जिन्हे मालूम नहीं कि शनि अष्टम-द्वादश का कारक होने के साथ षष्ठ और दशम का भी कारक है -उन्हें मालूम ही नहीं पर बहस में सानी नहीं। अब क्या किया जाए ,अपनी कलम का ढक्कन बंद रखूं या अपनी जुबान बंद रखु? मगर फिर आखिर में रोक नहीं पाता खुद को। मजे की बात तो ये है कि शनि जिस चीज का कारक है उसे तो मानते ही नही हैं,जैसे शनिदेव ”मुर्ख या मूर्खता” का कारक है -अभी भिड़ जाएंगे कई मेरे से कि ये क्या लिख रहे हैं आप? सूर्य की किरणे शनि ग्रह तक नहीं पहुँचती इस वजह से ये ग्रह ज्ञान से वँचित रह जाता शनि ”चोर” का कारक है -अब बताइये चोर न्याय करेगा या अदालत में बैठा न्यायाधीश ? अब कुछ फुंक जाएंगे कि अरे!!! शनि चोर का कारक कैसे हो गया? भई शनि अँधेरे का कारक है ,चोरी अँधेरे में। ”शनिवत राहु ” तो आज बच्चा-बच्चा जानता है -मगर कैसे शनि मुर्ख है तो राहु मूर्खता की पराकाष्ठा। इसलिए सूर्य ने राजा के तौर पर ”गुरु बृहस्पति” को शनि का शिक्षक नियुक्त किया है ताकि उसे कुछ ज्ञान प्राप्त हो -ये मिथ है और कुंडली में इसीलिए शनि की दोनों राशियों के तरफ गुरु की राशियाँ है -धनु मकर और कुम्भ के बाद मीन। ज्योतिष को अनुभव के साथ और अपने आस-पास के वातावरण से मिला कर समझना चाहिए न कि DJ बजाते रहे। सूर्य राजा है तो न्याय कौन करेगा ? भाई साधारण अपने आस-पास देखिये शनिदेव श्रमिक-वर्ग प्रतिनिधित्व करतें है । क्या आपको श्रमिक समाज में न्याय करते दिखाई देते हैं? या न्याय की गुहार लगाते दिखाई देते है या फिर किसी निम्न स्तर के अपराध में लिप्त —राहु का वर्चस्व बढ़ा तो वही समाज में नाम किया हुआ गुंडा -शनि-वत राहु यानी शनि का एक्सटेंशन है राहु -जो विचार शनि के मन में ”सुप्त” रूप से विराजमान है वही विचार राहु में खुल आते हैं। अब जहाँ तक बात है शनि की साढ़ेसाती की तो कुंडली में बैठे शनि बलाबल पर निर्भर होगा की वो कितना तकलीफ देगा। शनि की साढ़ेसाती में वक्ती तौर पर जो ऊंचाइयां मिलती है उसका अंत फल अच्छा नहीं होता -अब कई तर्क ये भी हैं की शनि के साढ़ेसाती में प्रधानमंत्री भी बनता है जातक -पर जरा विचार करे ये कुर्सी आरामदायक है या परेशानियों का वायस सफल तो हो ही सकता है अगर कुंडली में योग हो तो और चूँकि ”शनिदेव है कूटनीति के परिचायक ” कूटनीति की सबसे ज्यादा जरुरत राजनीति में ही तो पड़ती है। राहु राजनीती का कारक -फिर सोचिये ”शनिवत राहु” …
आप इसे अब जरा सीधे तरीके से समझिये ”सूर्य” सत्ता का कारक हैं ”मङ्गल” सेनापति सत्ता की रक्षा करते हुए – गुरुदेव बृहस्पति ज्ञान का प्रतिनिधित्व करते हुए – दरअसल बृहस्पति न्याय के कारक देवता हैं – जज बनना हैं तो कुण्डली में बृहस्पति मजबूत होना होगा।
शनि न्याय-प्रक्रिया का अंग है मगर किस रूप में है ये नहीं समझना नहीं चाहता कोई -शनि हुक्म का पालन करता है सिर्फ न्याय प्रक्रिया में जो हुक्म या न्याय बृहस्पति द्वारा किया जा चुका होता है।आदेश का पालन करना शनिदेव का काम है – ध्यान रहे शनिदेव षष्ठ भाव के कारक है और षष्ठ भाव है दास-नौकर का प्रतीक – अब बताइये दास या नौकर न्याय करता हैं या आदेश का पालन ?
शनि है “यमाग्रजम” है यानी यम से पहले आने वाला। इसका मतलब शनिदेव रोग का कारक हैं और बुढ़ापे में मृत्यु के पहले ज्यादातर व्यक्ति रोगग्रस्त होते हैं उसके बाद यमराज आकर ले जाते हैं क्योंकि शनि मृत्यु का कारक भी हैं।
आपको ये ध्यान रखना होगा कई सूर्य निर्माण का कारक है और शनि ”विध्वंश” का कारक।

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