पूणे

‘फुले’ फिल्म तत्कालीन वास्तविकता को दर्शाने वाली है – डॉ. हुलगेश चलवादी

फुले’ फिल्म तत्कालीन वास्तविकता को दर्शाने वाली है – डॉ. हुलगेश चलवादी

टीज़र के आधार पर अनावश्यक विवाद खड़ा करना गलत – डॉ. चलवादी

 

पुणे:आगामी समय में प्रदर्शित होने जा रही ‘फुले’ फिल्म के कुछ दृश्यों पर जातीय तनाव उत्पन्न होने की आशंका के आधार पर आपत्ति लेना अनुचित और पूरी तरह से गलत है। तत्कालीन सामाजिक स्थिति की सच्चाई को दर्शाते हुए यह फिल्म स्थापित वर्ग की आँखें खोलने का काम करेगी, ऐसा प्रतिपादन बहुजन समाज पार्टी के प्रदेश महासचिव एवं पश्चिम महाराष्ट्र ज़ोन के मुख्य प्रभारी डॉ. हुलगेश चलवादी ने गुरुवार (10 अप्रैल) को किया।

 

टीज़र के आधार पर कुछ लोगों द्वारा फिल्म को लेकर जानबूझकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। समाज का वास्तविक प्रतिबिंब इस फिल्म में दिखाई देता है। इससे पहले भी विभिन्न फिल्मों के माध्यम से सामाजिक स्थिति को समझने का कार्य किया गया है। फुले दंपति द्वारा स्त्री शिक्षा के लिए किए गए संघर्ष सर्वविदित हैं। इतिहास को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करना निश्चित ही अनुचित है, लेकिन जब फिल्म के माध्यम से तीव्र सत्य को प्रस्तुत किया जा रहा है, तब निर्देशक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आघात नहीं होना चाहिए, यह जिम्मेदारी समाज की है, ऐसा डॉ. चलवादी ने कहा।

 

फुले दंपति को उस समय के समाज विरोधियों से जो अपमानजनक व्यवहार मिला, उसे पर्दे पर दर्शाना गलत और भावनाएं भड़काने वाला कैसे हो सकता है? यह सवाल डॉ. चलवादी ने उठाया। स्त्री शिक्षा का संकल्प लेने वाले क्रांतिसूर्य महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने बहुत कुछ सहा। सावित्रीबाई पर गोबर फेंका जाता था। वे दो साड़ियाँ लेकर स्कूल जाया करती थीं। गोबर फेंके जाने के बाद स्कूल में जाकर खुद को साफ करके दूसरी साड़ी पहनतीं और फिर शिक्षण कार्य करतीं। यदि तत्कालीन समाज के अत्याचारों को फिल्म के माध्यम से दर्शाया जा रहा है, तो उसका विरोध क्यों? यही प्रश्न डॉ. चलवादी ने किया।

 

‘फिल्म एकतरफा न होकर सर्वसमावेशी होनी चाहिए’ — ऐसा मत दृश्य पर आपत्ति जताने वालों द्वारा व्यक्त किया गया है। लेकिन, फिल्म के माध्यम से प्रस्तुत की जाने वाली तत्कालीन सामाजिक स्थिति की सच्चाई स्वयं में ही समावेशी होती है। सर्वसमावेशी भावना केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। पीड़ित, शोषित, वंचितों के जीवन को नकारने वालों के भीतर ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की भावना को स्थान देना होगा, ऐसा मत डॉ. चलवादी ने व्यक्त किया।

 

फिल्म के बहाने बहुजनों पर सांस्कृतिक दबाव डाला जा रहा है। बहुजनों पर अब तक डाले गए सांस्कृतिक प्रभाव और दबाव से मुक्त होने का समय आ गया है। फिल्म में दिखाए गए सत्य और यथार्थ दृश्यों को हटाना नहीं चाहिए। सच्चा इतिहास लोगों के सामने आना ही चाहिए, ऐसा आवाहन डॉ. चलवादी ने किया।

 

 

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