पूणे

एससी-एसटी अत्याचारों के खिलाफ त्वरित सजा का प्रावधान जरूरी: बसपा महासचिव डॉ. हुलगेश चलवादी

एससी-एसटी अत्याचारों के खिलाफ त्वरित सजा का प्रावधान जरूरी: बसपा महासचिव डॉ. हुलगेश चलवादी

 

सरकार दोषसिद्धि दर बढ़ाने के लिए प्रयास करे – डॉ. चलवादी की मांग

 

पुणे: डीएस तोमर 

 

महाराष्ट्र राज्य मंत्रिमंडल ने स्वतंत्र ‘अनुसूचित जनजाति आयोग’ की स्थापना को मंजूरी दी है, साथ ही अनुसूचित जाति और जनजाति दोनों आयोगों को वैधानिक दर्जा देने का निर्णय लिया गया है। इस फैसले का स्वागत करते हुए बहुजन समाज पार्टी के प्रदेश महासचिव और पश्चिम महाराष्ट्र जोन के मुख्य प्रभारी डॉ. हुलगेश चलवादी ने कहा कि एससी-एसटी समुदाय पर हो रहे अत्याचारों के मामलों में त्वरित सजा का प्रावधान जरूरी है।

 

डॉ. चलवादी ने बताया कि 51वीं जनजाति सलाहकार परिषद ने महाराष्ट्र में स्वतंत्र अनुसूचित जनजाति आयोग की सिफारिश की थी। आयोग की स्थापना से जनजातीय समुदाय की समस्याओं पर अधिक प्रभावी ध्यान दिया जा सकेगा, लेकिन पिछड़े वर्गों पर अत्याचार की बढ़ती घटनाएं चिंता का विषय हैं। उन्होंने कहा कि आयोग को ऐसे मामलों की त्वरित संज्ञान लेकर उचित दिशा-निर्देश देने चाहिए, जिससे पीड़ितों को शीघ्र न्याय मिल सके।

 

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र में अनुसूचित जातियों के खिलाफ 2,509 अपराध दर्ज हुए, जिनमें 2,198 मामलों में आरोप पत्र दाखिल हुए, लेकिन केवल 114 मामलों में दोष सिद्ध हुए। 2022 में यह संख्या बढ़कर 2,623 हो गई, जिसमें 2,286 मामलों में आरोप पत्र दाखिल हुए और सिर्फ 139 मामलों में ही सजा हुई, यानी दोषसिद्धि दर मात्र 5.2% रही। डॉ. चलवादी ने कहा कि दोषसिद्धि दर बेहद कम होने के कारण अत्याचार की घटनाएं बढ़ रही हैं।

 

अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ भी स्थिति चिंताजनक है। 2021 में एसटी पर अत्याचार के 628 मामले दर्ज हुए, जिनमें 557 में आरोप पत्र दाखिल हुए, लेकिन सिर्फ 12 मामलों में ही दोष सिद्ध हुआ। 2022 में ऐसे अपराधों में 18% की वृद्धि हुई, कुल 724 मामले दर्ज हुए, 591 में आरोप पत्र दाखिल हुए, लेकिन केवल 25 मामलों में ही दोष सिद्धि हुई। डॉ. चलवादी ने आशंका जताई कि इससे पीड़ित समाज में न्याय प्रक्रिया के प्रति अविश्वास और असुरक्षा की भावना बढ़ सकती है।

 

डॉ. चलवादी ने कहा कि दलित और आदिवासी समाज पर अत्याचार रोकने के लिए कानून तो हैं, लेकिन सजा का अनुपात बेहद कम है। दोषसिद्धि दर बढ़ाने के लिए कानूनी सुधार, न्यायिक प्रक्रिया में तेजी और प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही तय करना जरूरी है।

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