संपादकीय

हिंदी-मराठी नहीं, यह लोकतंत्र पर चोट है — चुनावी राजनीति की विभाजनकारी चालें अब बेनकाब होनी चाहिएं

हिंदी-मराठी नहीं, यह लोकतंत्र पर चोट है — चुनावी राजनीति की विभाजनकारी चालें अब बेनकाब होनी चाहिएं

महाराष्ट्र में जब कोई ऑटोचालक सिर्फ हिंदी बोलने की वजह से थप्पड़ खाए,जब मॉल में एक व्यापारी को ‘बाहरी’ बताकर  हिंदी न बोलने पर अपमानित किया जाए, फिर जबरन पैर पकड़वायें जाए-

जब स्वीट हाउस पर ग्राहक को सिर्फ भाषा के आधार पर  और  गाली मांफी दी जाए थप्पड़  बरसाएं जायें—

तो समझना होगा कि यह केवल भाषायी विवाद नहीं, लोकतंत्र की जड़ पर पड़ता हथौड़ा है।

 

महाराष्ट्र में बीते कुछ सप्ताह से जो घटनाएं सामने आ रही हैं, वे किसी स्थानीय असहमति का परिणाम नहीं हैं।

यह हर चुनाव से पहले दोहराई जाने वाली वह स्क्रिप्ट है, जिसमें एक वर्ग को ‘बाहरी’ बताकर स्थानीय अस्मिता के नाम पर भीड़ को उकसाया जाता है।

ऐसा 2008 में भी हुआ था।

तब भी पुलिस और प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए थे —“सरकार का आदेश है, हम कुछ नहीं कर सकते।”

तब भी ईमानदार अधिकारी कान में फुसफुसा कर कहते थे —“कुछ दिन गांव लौट जाइए, यहां हालात काबू से बाहर हैं।”

आज 2025 है।

लेकिन हालात जस के तस हैं।

इस बार फर्क सिर्फ इतना है —

महाराष्ट्र और बिहार, दोनों राज्यों में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं।

दोनों राज्यों की ज़मीन पर भाषा को हथियार बनाया जा रहा है, क्योंकि सत्ता तक पहुंचने के लिए अब भाषा की लाशों से रास्ता बनाया जा रहा है।?

 

क्या भारत में कोई नागरिक दूसरे राज्य में सम्मान से काम नहीं कर सकता?

क्या संविधान की धारा 19 केवल किताबों तक सीमित रह गई है?

 

महाराष्ट्र की जमीन से ऐसी घटनाएं सामने आना शर्मनाक ही नहीं, खतरनाक संकेत भी हैं।

मुख्यमंत्री से लेकर गृहमंत्री तक मौन हैं।

केंद्र सरकार भी खामोश है।

क्यों?

क्योंकि इस बार राजनीति को भाषा से वोट चाहिए चाहे उसके लिए समाज ही क्यों न टूट जाए।

मनसे, शिवसेना (उद्धव गुट) और क्षेत्रीय दलों को लगता है कि ‘स्थानीय बनाम बाहरी’ की आग में उनकी सियासत चमकेगी।

एनसीपी (शरद गुट) और कांग्रेस की चुप्पी उनकी रणनीति का हिस्सा है — INDIA गठबंधन के भीतर टकराव टालने के लिए।

बीजेपी की चुप्पी उसकी रणनीति है — महाराष्ट्र जैसे राज्य को हाथ से नहीं जाने देने की मजबूरी।

और तमाशा देखने वालों की कतार में कई ‘घोषित सेक्युलर’ दल भी हैं।

उधर बिहार में राजनीतिक दल हिंदीभाषियों के स्वाभिमान की बात करते हैं,लेकिन महाराष्ट्र में उन्हीं हिंदीभाषियों की पिटाई पर चुप्पी साध लेते हैं।

क्या वोट बैंक की सुविधा के अनुसार न्याय और अन्याय का तराजू तय होगा?लेकिन इस सियासत की सबसे बड़ी कीमत कौन चुका रहा है?

— वो युवा, जो मेहनत से ऑटो चलाता है— वो व्यापारी, जो सिर्फ रोज़ी-रोटी के लिए महाराष्ट्र आया है— वो विद्यार्थी, जो हरियाणा, यूपी, बिहार या एमपी से पुणे या मुंबई में पढ़ाई कर रहा है

अगर आज उनकी भाषा को अपराध बना दिया गया,तो कल और कौन सी पहचान निशाने पर होगी — इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं।यह सिर्फ हिंदी और मराठी का टकराव नहीं — यह एक भारत के विचार पर हमला है।एक ऐसा हमला, जिसमें राज्य सरकारें चुप हैं,

प्रशासन लाचार है,और आम जनता डरी हुई है।

मूल सवाल यही है —

क्या भाषाएं अब वोट बैंक बन चुकी हैं?

क्या नागरिकता की शर्त अब भाषा होगी?

इस देश ने भाषा के नाम पर बंटवारा नहीं, एकता की मिसालें दी हैं।लेकिन कुछ राजनीतिक दल बार-बार उसी ज़ख्म को कुरेदने का काम कर रहे हैं।

अब वक्त है कि जनता खुद सवाल करे —

और इस बार सिर्फ चुनाव में नहीं, चुनाव से पहले भी।

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