
‘उस’ मंदिर में फिर से जाने की हमारी इच्छा ही मर गई! — पुणे के पूर्व विधायकों ने जताई तीव्र पीड़ा
महाराष्ट्र विधानमंडल में अपराधियों के बढ़ते हस्तक्षेप के खिलाफ पुणे स्थित पूर्व विधायकों की संयुक्त प्रेस वार्ता
ब्यूरो विशाल समाचार पुणे
पुणे: महाराष्ट्र विधानमंडल में बढ़ते गुंडाराज और अपराधियों की घुसपैठ के खिलाफ पुणे में रह रहे वरिष्ठ पूर्व विधायकों ने तीव्र आक्रोश व्यक्त किया है। “हम फिर कभी उस मंदिर (विधानसभा) में प्रवेश करना नहीं चाहेंगे, जिसकी गरिमा आज रौंदी जा रही है,” — ऐसी भावनात्मक प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने वर्तमान राजनैतिक माहौल पर गहरी चिंता जताई।
युवक क्रांति दल की ओर से आयोजित इस संयुक्त प्रेस वार्ता में डॉ. कुमार सप्तर्षि, एड. वंदना चव्हाण, एड. जयदेवराव गायकवाड़, बाळासाहेब शिवरकर, एड. एल.टी. सावंत, संयोजक राहुल डंबाळे सहित कई प्रमुख पूर्व विधायक उपस्थित रहे।
डॉ. कुमार सप्तर्षि ने कहा, “महाराष्ट्र की 12 करोड़ जनता ने अपने मतदान से 288 विधायकों को विधानमंडल में भेजा है ताकि वे जनता के सुख-दुख, सुविधाएं और समस्याओं का प्रतिनिधित्व करें। हमारा काम सिर्फ माध्यम बनना था — असली मालिक तो जनता है। पर आज विधायिका की दिशा ही पलट गई है।”
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में बहुमत से आई सरकार का काम जनहित में कार्य करना होता है, और अल्पमत में बैठे विपक्ष का कार्य जनता के हक़ में निगरानी रखना होता है। लेकिन आज के दौर में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद नहीं, बल्कि शत्रुता का माहौल है।
16 जुलाई 2025 को हुई घटना का जिक्र करते हुए डॉ. सप्तर्षि ने कहा, “सरकार पक्ष के विधायक गोपीचंद पडळकर, जो मुख्यमंत्री के करीबी माने जाते हैं, वे नामी अपराधियों को विधानमंडल परिसर में ले आए। उन्हीं के जरिए विरोधी पक्ष के विधायक जितेंद्र आव्हाड के कार्यकर्ता पर हमला करवाया गया। इस हमले के चश्मदीद विधायक खुद थे, और यह पूरी घटना मीडिया कैमरों में कैद हुई, जिससे पूरे देश ने देखा कि लोकतंत्र का मंदिर कैसे अपवित्र किया गया।”
उन्होंने तीखे लहजे में कहा, “लोकतंत्र की मंदिर को वही नष्ट करता है, जिसे लोकतंत्र अस्वीकार्य हो। आज की सरकार सौदेबाज़ और अवसरवादी तत्वों के गठजोड़ से बनी है, और यह विपक्ष को खत्म करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में विधानसभा भंग कर पुनः चुनाव कराना आवश्यक प्रतीत होता है।”
वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व विधायक रामदास फुटाणे ने कहा, “पहले राजनीति का अपराधीकरण हुआ और अब ऐसा लग रहा है मानो अपराधियों ने ही सरकार पर कब्ज़ा कर लिया हो। ऐसी स्थिति में हम लोकतंत्र को नष्ट करने वाले इन तत्वों का एक स्वर में विरोध करते हैं और जनता की अदालत में यह मुद्दा दर्ज कराते हैं। आज की विधायिका में चर्चा नहीं, बल्कि शारीरिक हिंसा का बोलबाला है। यह दृश्य पहले कभी नहीं देखा गया।”
पूर्व सांसद एड. वंदना चव्हाण ने कहा, “आज राज्य में गृह मंत्री हैं भी या नहीं — यह प्रश्न खड़ा हो रहा है। यदि हैं, तो अब तक इस पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? जब नेता खुद आपराधिक प्रवृत्ति अपनाएं, तो जनता क्या करे? शिक्षा, कृषि, रोजगार जैसे गंभीर विषय आज विधानमंडल के कोलाहल में दबते जा रहे हैं।”
पूर्व मंत्री बाळासाहेब शिवरकर ने कहा, “आज महाराष्ट्र की संस्कृति को विधानमंडल के भीतर कलंकित किया जा रहा है। यदि किसी विधायक की कोई शिकायत है, तो उसे समिति के माध्यम से सुलझाया जा सकता है। लेकिन सत्ता पक्ष के विधायक आज मारपीट पर उतर आए हैं — यह दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है। क्या आज के नेताओं को संविधानिक मूल्यों और विधायिका की भूमिका का विस्मरण हो गया है?”
निष्कर्ष में, पुणे के पूर्व विधायकों ने एक स्वर में यह मांग रखी कि वर्तमान विधायिका को भंग कर राज्य में फिर से चुनाव कराए जाएं और लोकतंत्र की गरिमा बहाल की जाए।



