
पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी के आदेश की अवमानना!
गरीबों के घर उजड़ने नहीं देंगे – डॉ. हुलगेश चलवादी
इंदिरानगर वासियों को वायुसेना की नोटिस
पुणे: देश की पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी द्वारा ‘गरीबी हटाओ’ का नारा देकर समाज के वंचित तबकों को मुख्यधारा में लाने की जो ऐतिहासिक पहल की गई थी, उसकी भावना को रक्षा मंत्रालय ने आज भुला दिया है। स्वतंत्रता-पूर्वकालीन ‘बर्माशेल’ और वर्तमान की ‘इंदिरानगर’ बस्ती को खाली करने का नोटिस वायुसेना द्वारा जारी किया गया है, जो कि गरीबों के हक का घर छीनने का प्रयास है।
इस अन्याय के विरोध में बहुजन समाज पार्टी के प्रदेश महासचिव एवं पश्चिम महाराष्ट्र ज़ोन प्रभारी डॉ. हुलगेश चलवादी ने बुधवार (30 जुलाई) को स्पष्ट किया कि किसी भी परिस्थिति में झुग्गीवासियों पर अत्याचार नहीं होने दिया जाएगा। यदि प्रशासन इंदिरानगर बस्ती को उजाड़ने का प्रयास करता है, तो संविधानिक मार्ग से तीव्र आंदोलन किया जाएगा, ऐसा डॉ. चलवादी ने चेतावनी भरे स्वर में कहा।
इस विषय में डॉ. चलवादी ने राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, नगर विकास विभाग, पुणे विभागीय आयुक्त, ज़िलाधिकारी एवं पुणे मनपा के शहर अभियंता प्रशांत वाघमारे को ज्ञापन सौंपते हुए गरीबों को न्याय दिलाने की मांग की है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आवश्यकता पड़ी तो उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय और यहां तक कि राष्ट्रपति से भी न्याय की गुहार लगाई जाएगी।
गौरतलब है कि यह बस्ती कई दशकों से उसी स्थान पर बसी हुई है। स्वतंत्रता के बाद इसे हटाने के कई प्रयास किए गए, किंतु तत्कालीन नगरसेवक स्व. शरद रणपिसे, स्व. मरिअप्पा चलवादी, स्व. तात्या ओव्हाळ, गणपत धोत्रे एवं अन्य नेताओं ने जब इंदिरा गांधी के समक्ष यह मुद्दा उठाया, तो उन्होंने तत्काल आदेश देकर वर्ष 1980 में इस बस्ती के पुनर्वसन की प्रक्रिया शुरू करवाई। यह बस्ती अब सरकार द्वारा अनुमोदित विकास आराखड़े में भी सम्मिलित है। ऐसे में पुनः बस्ती हटाने का नोटिस देना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि अचंभित करने वाला भी है।
इस बस्ती में पिछले चार दशकों से एससी, एसटी, विमुक्त जाति, भटक्या समाज तथा अल्पसंख्यक समुदाय के परिवार रह रहे हैं, जिनकी आजीविका मुख्यतः मज़दूरी एवं छोटे व्यवसायों पर आधारित है। सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति 12 वर्षों से अधिक समय से किसी भूमि पर निवास कर रहा हो, तो वह भूमि उसकी मानी जाती है। ऐसे में यह बस्ती अवैध कैसे मानी जा सकती है? यही प्रश्न डॉ. चलवादी ने उठाया है। उन्होंने इसे कानून प्रक्रिया के विरुद्ध व नागरिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाला कदम बताया।

