
ध्यान में डूबी कलावती का अंतर्नाद – डॉ. अरुणा ढेरे
विदुषी शमा भाटे की पुस्तक ‘नृत्यमय जग… नर्तन का धर्म’ का लोकार्पण
पुणे: “घुँघरुओं की झंकार जैसे एक कलावती का अपने ध्येय में डूबा हुआ अंतर्नाद, वैसा ही अनुभव विदुषी शमा भाटे के लेखन से मिलता है,” ऐसा प्रतिपादन वरिष्ठ साहित्यकार व साहित्य सम्मेलन की पूर्व अध्यक्ष डॉ. अरुणा ढेरे ने किया। उन्होंने कहा कि कला-साधना को गंभीरता और प्रामाणिकता से करने वाले सभी कलाकार एक ही पथ पर चलते हैं और कभी न कभी, किसी न किसी मोड़ पर मिलते भी हैं।
वरिष्ठ कथक नृत्यांगना, नृत्यगुरु, कोरियोग्राफर एवं लेखिका विदुषी शमा भाटे की पुस्तक ‘नृत्यमय जग… नर्तन का धर्म’ का लोकार्पण आज टिळक रोड स्थित ज्योत्स्ना भोळे सभागृह में हुआ। यह पुस्तक राजहंस प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है। इस अवसर पर लेखिका शमा भाटे, पुस्तक संपादक वंदना बोकील, डॉ. अरुणा ढेरे और राजहंस प्रकाशन के दिलीप माजगावकर मंच पर उपस्थित थे। कार्यक्रम में वरिष्ठ नृत्यांगना सुचेता भिड़े चापेकर, मनीषा साठे, तबला वादक पद्मश्री पं. विजय घाटे समेत कला जगत के कई गणमान्य उपस्थित रहे।
डॉ. अरुणा ढेरे ने कहा – “शमाताई के लेखन में संवादी नाद है। उनकी दृष्टि सूक्ष्म, लेखन प्रांजल और कथन शैली सहज है। परंपरा और नवता का सुंदर समन्वय, आत्मकथन में परख और आत्मस्वीकृति का साहस इस पुस्तक को विशेष बनाता है। शमाताई का अनुभव बताता है कि नृत्य केवल शास्त्र तक सीमित नहीं, बल्कि उससे आगे एक गहन जीवनानुभव है।”
दिलीप माजगावकर ने कहा – “शमा भाटे का नाम ही अलग सोच और अलग अंदाज का पर्याय है। कथक उनकी पहचान जरूर है, लेकिन उनका दायरा अन्य कलाओं और साहित्य तक फैला हुआ है। पुस्तक में उनका आत्मकथन कलायात्रा और व्यक्तिगत जीवन की समिश्रता है। लेखन दो स्तरों पर चलता है—भूतकालीन घटनाओं का तृतीय पुरुष में विवरण और नृत्य का आत्मानुभव प्रथम पुरुष में। यह अनोखी संरचना मराठी साहित्य में दुर्लभ है।”
शमा भाटे ने मनोगत रखते हुए कहा – “यह लेखन मेरे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रशिक्षण, उस समय के कलाजगत की घटनाओं, मेरे विचारों पर उनके प्रभाव और कथक नृत्य की अपार संभावनाओं की खोज को ध्यान में रखकर किया गया है। यह उस साधक की कथा है जिसने नृत्य जिया, उसी में ठोकरें खाईं और उसी में मोहर भी पाया।”
वंदना बोकील ने कहा – “शमा भाटे विचारशील कलाकार हैं। परफॉर्मिंग आर्ट में स्वतंत्र चिंतन करने वाले कलाकार दुर्लभ होते हैं, और शमा जी उनमें से एक हैं। लेखन में आत्मस्वीकृति, सहज भाषा, सूक्ष्म दृष्टि और मिष्किल विनोदभाव झलकता है। पुस्तक में उनके 50 वर्षों की कलायात्रा के साथ समाज, संगीत, रंगभूमि और चित्रपट क्षेत्र की स्पंदनशील झलक भी मिलती है।”
कार्यक्रम में शमा भाटे की शिष्याएं अमीरा पाटणकर और अवनी गद्रे ने सूर्यवंदना प्रस्तुत की। गौरी लागू और गौरी देशपांडे ने पुस्तक के कुछ अंशों का अभिवाचन किया। नीरजा आपटे ने सूत्रसंचालन किया और आभार अमीरा पाटणकर ने माना।



