महाराष्ट्रपूणे

पेंशनरों का दशहरा प्रशासन की लापरवाही से हुआ फीका – डॉ. तुषार निकाळजे

पेंशनरों का दशहरा प्रशासन की लापरवाही से हुआ फीका डॉ. तुषार निकाळजे

 

पुणे/ महाराष्ट्र:दसरे का पर्व पूरे देश में उल्लास और उमंग से मनाया जाता है। परंतु इस बार हजारों सेवानिवृत्त कर्मचारी और पेंशनर दशहरे का त्योहार ‘काटकसरी’ से मनाने को मजबूर हैं। वजह है – शासन और वित्त विभाग की घोर लापरवाही।

जिन कर्मचारियों की प्रोविजनल पेंशन जारी है, उन्हें पिछले महीने की पेंशन अब तक नहीं मिली है। नियमित पेंशनर भी आज तक अपने हक की पेंशन से वंचित हैं। अगस्त महीने में 26 तारीख को पेंशन वितरित की गई थी। तब मंत्रालय ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि हर माह की पेंशन समय पर और माह समाप्त होने से पहले दी जाए। सवाल उठता है कि जब परिपत्रक जारी हुआ था तो फिर आजतक पेंशन क्यों रोकी गई?

पेंशनर केवल अपने परिवार का भरण-पोषण ही नहीं करते बल्कि कई लोग वृद्धाश्रम, दान, औषधि वितरण और सामाजिक कार्यों में भी सहयोग देते हैं। आज वही पेंशनर आर्थिक संकट में हैं। कई विद्यार्थियों की परीक्षा शुल्क की अंतिम तिथि 1 अक्तूबर थी, कुछ अभिभावकों को प्रवेश शुल्क भरना था, लेकिन शासन की नाकामी के कारण सेवानिवृत्त कर्मचारी बेबस खड़े हैं।

दसरे के तुरंत बाद दिवाली का पर्व आ रहा है। इतने कम समय में अगर पेंशन समय पर नहीं मिली, तो हजारों पेंशनर और उनके परिवार दिवाली भी अंधेरे में मनाने को मजबूर होंगे। यह स्थिति केवल तकनीकी कारण बताकर टाली नहीं जा सकती। यह सीधी-सीधी प्रशासनिक असफलता है।

डॉ. तुषार निकाळजे ने शासन से तीखा सवाल उठाया है –

“जब कार्यरत कर्मचारियों को हर त्योहार पर 30 से 40 हजार रुपये का फेस्टिवल एडवांस आसानी से दिया जाता है, तो पेंशनरों को उनके हक की पेंशन समय पर क्यों नहीं मिलती? क्या सेवानिवृत्त कर्मचारी शासन के लिए बोझ हैं? समाज का अदृश्य आधारस्तंभ भूलने की गलती क्यों बार-बार की जा रही है?”

 

वे कहते हैं कि बीते 20 वर्षों से ई-गवर्नेंस और डिजिटलीकरण का ढोल पीटा जा रहा है, मगर सेवानिवृत्त कर्मचारियों को समय पर पेंशन देने जैसी बुनियादी व्यवस्था अब तक सुधारी नहीं गई। शासन और वित्त मंत्रालय को जवाब देना होगा कि आखिरकार पेंशनरों को उनके त्योहार पर यह अपमान क्यों झेलना पड़ा।

“त्योहार से कम-से-कम दो दिन पहले पेंशन मिलनी ही चाहिए, अन्यथा यह सीधे-सीधे पेंशनरों के सम्मान और जीवन पर प्रहार है।” – डॉ. तुषार निकाळजे कहा है।

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