
जटिल मुत्ररोग समस्या पर एस अस्पताल के डॉक्टरों द्वारा इस्तेमाल की गई नई रोबोटिक सर्जिकल तकनीक की रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित
पुणे, : वरिष्ठ मूत्र रोग विशेषज्ञ व एस हॉस्पिटल के अध्यक्ष डॉ.सुरेश पाटणकर इनके नेतृत्व में मूत्र रोग विशेषज्ञ डॉ.गुरूराज पडसलगी, डॉ.सचिन भुजबळ, डॉ.सौरभ उपलेंचवार इन्होने हालही में किडनी की जटिल स्थिति के लिए, रोबोटिक सहायता से लैप्रोस्कोपिक पाइलोलिथोटॉमी और बक्कल म्यूकोसल ग्राफ्ट (बीएमजी) प्रक्रियाएं की. यह नई तकनीक जटिल किडनी की स्थितियों में रोबोटिक तंत्रज्ञान के उपयोग में एक महत्वपूर्ण कदम है. यह दुनिया में इस प्रकार की पहली रोबोटिक सर्जरी है जो किसी शास्त्रीय नियतकालिक में प्रकाशित हुई है. इस पर एक लेख हाल ही में जर्नल ऑफ रोबोटिक सर्जरी जर्मनी में प्रकाशित हुआ था.
इसके बारे में जानकारी देते हुए एस हॉस्पिटल,एरंडवणे पुणे के अध्यक्ष प्रा.डॉ.सुरेश पाटणकर ने कहा की, कुछ समय पहले, एक 41 वर्षीय पुरुष मरीज पेट दर्द की शिकायत लेकर हमारे अस्पताल आया. निदान से पता चला कि उनकी किडनी शरीर में अपने सामान्य स्थान पर न होकर उनके पेल्विस में स्थित थी. इस स्थिति को एक्टोपिक किडनी कहा जाता है और यह एक दुर्लभ जन्मजात स्थिति है. इसके अलावा उनको किडनी स्टोन भी हुआ था और किडनी और मूत्रवाहिनी के जुड़ने वाले हिस्से में रुकावट भी पाई गई. ऐसी असामान्य शारीरिक रचना और जटिलताओं के जोखिम का इलाज आमतौर पर बहुत मुश्किल होता है.
एक्टोपिक किडनी एक दुर्लभ जन्मजात स्थिति है जिसमें किडनी और मूत्रवाहिनी के जोड़ (जंक्शन)पर रुकावटें हो सकती हैं, लेकिन आमतौर पर किडनी स्टोन नहीं पाए जाते. असामान्य संरचना, छोटी मूत्रवाहिनी, रक्त वाहिकाओं की जटिल स्थिति और आंतों की निकटता किसी भी प्रक्रिया को चुनौतीपूर्ण बना देती है. लैप्रोस्कोपिक सर्जरी को ओपन सर्जरी की तुलना में अधिक सुरक्षित माना जाता है और इससे मरीज जल्दी ठीक हो जाता है. हालाँकि, ऐसी स्थिति में, शल्य चिकित्सकों के लिए यह प्रक्रिया तकनीकी रूप से कठिन और समय लेने वाली हो सकती है. जिन मरीजों को पहले से ही किडनी स्टोन है, उनके लिए किडनी में अल्सर और सूजन परेशानी का कारण बन सकती है. इससे ऊतक भी कमज़ोर हो सकते हैं. इसलिए, ऐसी स्थिति में टांके लगाने से ये ऊतक को नुकसान हो सकता हैं और रक्तस्राव, संक्रमण और अन्य जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है. उपलब्ध वैद्यकीय मार्गदर्शक तत्त्व के अनुसार ऐसी सर्जरी को दो चरणों में करने की सिफारिश है, लेकिन रोबोटिक तंत्रज्ञान ने जटिल सर्जरी को भी अधिक सुरक्षित, अधिक कुशल और मरीजों तथा सर्जनों के लिए कम तनावपूर्ण बना दिया है.
इसलिए एस अस्पताल के डॉक्टरों की टीम ने रोबोटिक सर्जरी करने का फैसला किया,ऐसा डॉ.पाटणकर ने कहा. रोबोटिक सर्जिकल सिस्टम का उपयोग करके, हम किडनी स्टोन को निकालने और किडनी की बिघाड को एक साथ सटीकता से ठीक करने में सक्षम थे. हालाँकि, कई किडनी स्टोन्स और मूत्र मार्ग में पहले से हुए नुकसान के कारण यह प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण थी. इस प्रकार की जटिलता के प्रबंधन के लिए कोई मार्गदर्शक तत्त्व उपलब्ध नहीं हैं. किडनी स्टोन निकालने के अलावा, किडनी और मूत्रवाहिनी जहां पर मिलती है,उस क्षेत्र में संकुचन व कठोरता के कारण होने वाली रुकावट को दूर करने के लिए गाल के अंदर से त्वचा का एक छोटा सा टुकड़ा निकालकर वहां लगाया गया. इसके बाद मरीज़ की हालत में तेज़ी से सुधार हुआ और सर्जरी के चार दिन बाद उसे डिस्चार्ज दिया गया. उपलब्ध वैद्यकीय साहित्य की विस्तृत खोज से पता चला कि एक्टोपिक पेल्विक किडनी के मामले में इस तरह से किडनी स्टोन निकालने और बक्कल म्यूकोसल ग्राफ्ट (बीएमजी) का कोई रिकॉर्ड नहीं है. हमारे दावे को प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ़ रोबोटिक सर्जरी ने स्वीकार कर लिया है और इस प्रक्रिया को प्रकाशित भी कर दिया है.
शल्यचिकित्सकों के टीम में प्रा.डॉ.सुरेश पाटणकर इनके साथ मुत्ररोग विशेषज्ञ डॉ.गुरूराज पडसलगी,डॉ.सचिन भुजबळ, डॉ.सौरभ उपलेंचवार इनके साथ भूलतज्ञ डॉ.सोनाली वस्ते, डॉ.सुचिता हार्डिकर और डॉ.नेहा बनवट इनका समावेश था.

