पूणे

रसिकों ने अनुभव किया लता मंगेशकर और कवि ग्रेस का दुर्लभ स्मरण-रंजन

रसिकों ने अनुभव किया लता मंगेशकर और कवि ग्रेस का दुर्लभ स्मरण-रंजन

दीनायन कलापर्व’ में प्रस्तुत हुई हृदयनाथ मंगेशकर पर आधारित 20 वर्ष पुरानी दुर्लभ ध्वनिचित्रफीत

 

पुणे विशाल समाचार: विश्वविख्यात गायिका लता मंगेशकर और प्रसिद्ध कवि ग्रेस द्वारा पंडित हृदयनाथ मंगेशकर के बारे में व्यक्त किए गए भावपूर्ण, आत्मीय और प्रशंसात्मक उद्गार सुनने का अनोखा अवसर पुणे के संगीतरसिकों को मिला। लता दीदी द्वारा अपने भाई पर बोलते समय उनके सुरेल स्वर में प्रस्तुत की गई विभिन्न रचनाएँ, गज़लें, भजन, ज्ञानेश्वर रचित ओव्या, फिल्मी गीत आदि क्षण उपस्थित दर्शकों के लिए अत्यंत भावपूर्ण सिद्ध हुए।

 

पंडित हृदयनाथ मंगेशकर के हाल ही में संपन्न 89वें जन्मदिन के उपलक्ष्य में वरिष्ठ निर्माता अरुण काकतकर ने ‘दीनायन कलापर्व’ के माध्यम से 20 वर्ष पूर्व रिकॉर्ड की गई इन दुर्लभ ध्वनिचित्रफीतों का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। इन रेकॉर्डिंग्स में स्वयं लता मंगेशकर ने हृदयनाथजी के बाल्यकाल, संघर्ष, संगीताभ्यास और उनके रचनात्मक प्रवास की अनेक स्मृतियाँ अत्यंत आत्मीय भावना से व्यक्त की हैं। कार्यक्रम का संयोजन गायिका मनीषा निश्चल्स महक द्वारा किया गया।

 

इस अवसर पर भारती हृदयनाथ मंगेशकर, पं. सत्यशील देशपांडे, सुधीर गाडगीळ, अरुण नूलकर, अरुण काकतकर तथा मंगेशकर अस्पताल के वैद्यकीय संचालक डॉ. धनंजय केळकर उपस्थित थे। स्क्रीनिंग के बाद काकतकर ने हृदयनाथजी को आलिंगन दिया तो दोनों ही भावुक हो उठे। इन दो महान विभूतियों को कैमरे में कैद करना मेरे जीवन का सौभाग्य है, ऐसा काकतकर ने भाव-विवश होकर कहा।

कार्यक्रम के आयोजन के लिए डॉ. केळकर ने अरुण काकतकर और मनीषा निश्चल का सम्मान भी किया।

 

बाळ ने अपनी अलग और अनूठी शैली विकसित की: लता मंगेशकर

लता मंगेशकर ने हृदयनाथजी (बाळ) के बचपन को लेकर कहा, “हमारे पिता दीनानाथ मंगेशकर अपने समय की प्रचलित और लोकप्रिय गायकी का अनुसरण करने के बजाय अपनी स्वतंत्र शैली विकसित की थी। बाळ ने भी उसी आदर्श का अनुसरण किया। उसने अपनी अलग, मधुर, परंतु अत्यंत कठिन गायन-शैली गढ़ी है, जो आज व्यापक रूप से लोकप्रिय है। बाळ का अध्ययन अद्भुत है। उसका आवाज स्वच्छ और गूढ है। साधना के बल पर उसने अपनी गायकी को उच्च स्तर दिया है। वह एकाग्रचित्त कलाकार है. उसकी स्मरणशक्ती विलक्षण है। हम दोनों ने मिलकर ज्ञानेश्वरी, भगवद्गीता, मीरा, ग़ालिब, ‘शिवकल्याण राजा’, सावरकर रचित गीत, कोळीगीते आदि अनेक संगीत-प्रकल्प सफलतापूर्वक किए। मुझे लगता है कि अब संगीतकार के रूप में उसे नए स्वर और नए प्रतिभावान कलाकारों को आगे लाना चाहिए।”

 

काव्य और संगीत दोनों का अद्वितीय संगम: कवि ग्रेस

कार्यक्रम की शुरुआत कवि ग्रेस के ध्वनिचित्रित मनोगत से हुई। वे हृदयनाथ मंगेशकर की प्रशंसा में बोले, “काव्य में संगीत और संगीत में काव्य का सार समझनेवाले कलाकार यदि कोई है, तो वह पंडित हृदयनाथ मंगेशकर हैं। वे कविता के स्वरानुभव को पढ़ते हैं और काव्यानुभूति से जन्म लेने वाले संगीत की छाया उनकी प्रतिभा पर स्फुट रूप से दिखाई देती है। यह ऐसी प्रतिभा है जिस पर किसी को भी ईर्ष्या हो सकती है। मेरी कविताओं को ऐसा स्वरपुरुष मिला, यह मेरा सौभाग्य है।”

 

डॉ. केळकर ने कहा की, “मंगेशकर अस्पताल की प्रेरणा भले ही लता मंगेशकर से मिली हो, परंतु उसकी ज़िम्मेदारी और दैनंदिन कार्यभार हृदयनाथजी ने निभाया और ‘माई’ का स्वप्न साकार किया। उनकी प्रतिभा केवल संगीत तक सीमित नहीं, वह आध्यात्मिक ऊँचाई को स्पर्श करती है। उनकी रचनाएँ श्रोता को संगीत से आगे, एक गूढ अनुभूति की ओर ले जाती हैं। उनमें निहित भारतीयता, उनकी अध्ययनशील और चिकित्सक दृष्टि अत्यंत प्रेरणादायक है।”

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