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विधायक पुत्र सुरेंद्र पठारे ने प्रधानमंत्री मोदी को भी पीछे छोड़ा

विधायक पुत्र सुरेंद्र पठारे ने प्रधानमंत्री मोदी को भी पीछे छोड़ा

परिवारवाद विरोधी बयानों की कढ़ी, लेकिन ज़मीनी हकीकत में अपवादों का भात

पुणे : विशाल समाचार प्रतिनिधि

कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों पर परिवारवाद का आरोप लगाते हुए लगातार तीखे हमले करने वाली भारतीय जनता पार्टी स्वयं अब इसी मुद्दे पर असहज स्थिति में फँसती दिखाई दे रही है। एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भतीजी को नगरसेवक पद की उम्मीदवारी देने से इनकार किया गया है, वहीं दूसरी ओर दूसरे दल से भाजपा में आए पठारे परिवार ने अपने ही घर के तीन सदस्यों को टिकट दिलवाकर सीधे तौर पर प्रधानमंत्री मोदी के फैसले पर भी मात दी है। इसको लेकर राजनीतिक गलियारों में तीखी चर्चा शुरू हो गई है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाई प्रह्लाद मोदी की पुत्री सोनल मोदी ने अहमदाबाद महानगरपालिका के एक प्रभाग से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी। हालांकि, परिवारवाद का आरोप न लगे, इस उद्देश्य से भाजपा ने यह निर्णय लिया था कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं, विधायकों और सांसदों के रिश्तेदारों को टिकट नहीं दिया जाएगा। इसी नीति के तहत सोनल मोदी की उम्मीदवारी अस्वीकार कर दी गई। लेकिन अब यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या यह निर्णय वास्तव में केवल परिवारवाद के सिद्धांत के आधार पर लिया गया, या फिर इसके पीछे अपेक्षित आर्थिक सामर्थ्य का अभाव भी एक कारण था।

दूसरी ओर, पहले दूसरे राजनीतिक दल में सक्रिय रहे विधायक बापू पठारे ने अपने पुत्र को भाजपा में प्रवेश दिलाकर इस नीति से अपवाद प्राप्त कर लिया। पुणे महानगरपालिका के प्रभाग क्रमांक चार से विधायक के पुत्र सुरेंद्र पठारे और भतीजी की पत्नी तृप्ती भरणे को उम्मीदवार बनाया गया है, जबकि बहू ऐश्वर्या पठारे को प्रभाग क्रमांक तीन से टिकट दिया गया है। एक ही परिवार के तीन सदस्यों को उम्मीदवारी मिलने से पार्टी के उन निष्ठावान कार्यकर्ताओं में भारी नाराज़गी देखी जा रही है, जो वर्षों से संगठन के लिए काम कर रहे हैं। कई कार्यकर्ताओं ने प्रचार से दूरी बना ली है।

इस महापालिका चुनाव में सुरेंद्र पठारे सबसे अधिक संपत्ति वाले उम्मीदवार के रूप में सामने आए हैं। उनके द्वारा दाखिल किए गए शपथपत्र के अनुसार, उनके पास कुल 271 करोड़ 85 लाख रुपये की चल और अचल संपत्ति है। इसमें लग्ज़री वाहन, बहुमूल्य ज़मीनें और आवासीय संपत्तियाँ शामिल हैं। इन आँकड़ों को देखते हुए पार्टी के भीतर यह चर्चा खुलकर होने लगी है कि क्या इसी आर्थिक शक्ति के चलते पठारे परिवार को भाजपा के परिवारवाद विरोधी नियमों से छूट दी गई।

इसके अतिरिक्त, लोहेगांव क्षेत्र की कुछ ज़मीनों पर लगे आरक्षण हटवाने के लिए एक केंद्रीय मंत्री के हस्तक्षेप की भी चर्चा सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि इस प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर आर्थिक लेन-देन हुआ है। इन घटनाक्रमों के चलते भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ताओं और पारंपरिक मतदाताओं के बीच यह धारणा मजबूत हो रही है कि इतने बड़े आर्थिक लेन-देन की क्षमता के कारण ही पार्टी ने पठारे परिवार के लिए अपने ही नियमों को दरकिनार किया।

परिवारवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाने का दावा करने वाली भाजपा के लिए यह चुनाव केवल एक स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि पार्टी की घोषित नैतिक राजनीति और विश्वसनीयता की भी कड़ी परीक्षा बन गया है, ऐसा राजनीतिक जानकारों का मानना है।

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