पूणे

दूध और बीफ उद्योग का संबंध उजागर : पुणे में युवाओं का प्रभावी आंदोलन

दूध और बीफ उद्योग का संबंध उजागर : पुणे में युवाओं का प्रभावी आंदोलन

 

धवल क्रांति या गुलाबी क्रांति? पुणे एनिमल लिबरेशन ने सामने रखी हकीकत

 

पुणे  विशाल सिंह: गणतंत्र दिवस सप्ताह के अवसर पर चल रहे देशव्यापी अभियान के तहत पुणे के युवाओं ने भारत के दुग्ध उत्पादन और बीफ निर्यात उद्योग के आपसी संबंधों पर ध्यान आकर्षित किया। युवा-नेतृत्व वाले पशु अधिकार संगठन पुणे एनिमल लिबरेशन की ओर से जे.एम. रोड स्थित संभाजी उद्यान में तथ्य-आधारित और प्रभावशाली दृश्य प्रदर्शनी प्रस्तुत की गई।

 

प्रदर्शनी के माध्यम से यह बताया गया कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश होने के साथ-साथ बीफ का प्रमुख निर्यातक भी है। सरकारी और अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष 230 मिलियन टन से अधिक दूध का उत्पादन होता है, जबकि लगभग 1.3 मिलियन टन से अधिक बीफ का निर्यात किया जाता है। इस दौरान यह दावा किया गया कि दुग्ध आपूर्ति प्रणाली ही प्रत्यक्ष रूप से बीफ आपूर्ति श्रृंखला को बढ़ावा देती है।

 

दूध देने की क्षमता कम होने या आर्थिक रूप से लाभकारी न रहने पर पशुओं को बेच दिया जाता है और उन्हें मांस उद्योग की ओर मोड़ दिया जाता है। इस पहल के जरिए यह स्पष्ट किया गया कि डेयरी उद्योग और बीफ व्यापार अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।

 

कार्यकर्ताओं ने बताया कि शहरों की सड़कों पर दिखाई देने वाली घायल, कुपोषित और दूध देना बंद कर चुकी गायें इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं। पुणे के कई इलाकों में ऐसी गायें प्लास्टिक सहित कचरा खाते हुए दिखाई देती हैं, जो गंभीर चिंता का विषय है।

 

इस संदर्भ में पशु अधिकार कार्यकर्ता प्रविण ने कहा, “दूध देना बंद करने के बाद सड़कों पर दिखाई देने वाली कई गायें पास की डेयरियों से ही आती हैं—यह बात अधिकांश लोगों को पता नहीं होती। दूध और मांस उद्योग के इस संबंध को समझने के लिए नागरिकों को ‘माँ का दूध’ नामक जानकारीपरक डॉक्यूमेंट्री देखनी चाहिए।”

पशु अधिकार कार्यकर्ता श्वेता बोरगांवकर ने कहा, “यह आम धारणा है कि दूध और मांस उद्योग अलग-अलग हैं, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि ये एक ही श्रृंखला के हिस्से हैं। जब पशु दूध के लिए उपयोगी नहीं रहते, तो उन्हें मांस उद्योग में धकेल दिया जाता है। इस सच्चाई पर जन-जागरूकता आवश्यक है।”

 

चेतन शिंदे ने कहा, “मांस उत्पादन की ‘गुलाबी क्रांति’ के बिना दुग्ध उत्पादन की ‘धवल क्रांति’ संभव नहीं है। दूध की बढ़ती मांग ऐसे पशुओं की संख्या बढ़ाती है, जिनकी जिम्मेदारी अंततः कत्तल उद्योग पर आ जाती है। अब समय आ गया है कि इन दोनों उद्योगों को अलग-अलग देखने की सोच बदली जाए।”

 

आयोजकों ने बताया कि ठाणे, बेंगलुरु, जयपुर सहित देश के अन्य नौ शहरों में भी भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों पर इसी तरह की प्रदर्शनी आयोजित की गई है। इस अभियान का उद्देश्य डेयरी उद्योग और मांस व्यापार के बीच के अटूट संबंध पर फैले मौन को तोड़ना है।

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