संपादकीय

मंच से न्याय नहीं, आवेदन की मांग

मंच से न्याय नहीं, आवेदन की मांग

कौशांबी के सरस महोत्सव में घटी एक घटना ने सत्ता और संवेदनशीलता के बीच की दूरी को फिर उजागर कर दिया। कार्यक्रम में पहुंची एक महिला—अपने तीन बच्चों के साथ—मंच के पास खड़ी होकर पति की हत्या का आरोप लगाते हुए न्याय की गुहार लगाती रही। लेकिन मंच से उसे जो जवाब मिला, वह था—पहले लिखित आवेदन दीजिए। यह जवाब उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य की ओर से आया, जिसके बाद सुरक्षाकर्मियों ने महिला और उसके बच्चों को वहां से हटा दिया। घटना का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और सवाल खड़े कर रहा है।

सवाल यह नहीं है कि प्रशासनिक प्रक्रिया क्या कहती है। सवाल यह है कि जब एक महिला अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ सार्वजनिक मंच पर खड़ी होकर पति की हत्या का आरोप लगा रही हो, तब क्या उसे नियमों की किताब दिखाना ही सबसे पहला कदम होना चाहिए? क्या एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि मौके पर मौजूद अधिकारियों को जांच का निर्देश नहीं दे सकता था? क्या पीड़िता की बात सुनना इतना कठिन था?

लोकतंत्र में मंच केवल भाषण देने के लिए नहीं होते, बल्कि जनता की पीड़ा सुनने के लिए भी होते हैं। अगर मंच तक पहुंची फरियाद को भी “लिखित आवेदन” की दीवार के पीछे धकेल दिया जाए, तो फिर आम आदमी के लिए न्याय का दरवाजा आखिर खुलेगा कहां? सत्ता का असली कद भाषणों से नहीं, बल्कि ऐसे ही कठिन और असहज क्षणों में दिखाई देता है।

यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि सत्ता में बैठे लोगों के लिए नियमों से अधिक जरूरी संवेदनशीलता होती है। क्योंकि जिस लोकतंत्र में पीड़ित की आवाज मंच तक पहुंचकर भी अनसुनी रह जाए, वहां जनता के मन में व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होना स्वाभाविक है।

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